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और मैं जो आपके घर आकर ईद मनाउं तो ?

Posted On 12:09 pm by विनीत कुमार |

मयूर विहार में वो मेरी इक्सक्लूसिव और आखिरी मेड थी. वो मजाक में कहा करती- भइया, आप हमको काम करने के नहीं, बात करने के पैसे देते हो ? बताओ, हमको खाना टाइम से बनाना चाहिए तो आते ही चाय बनाकर मेरे साथ चाय पीने लग जाते हो. बदले में मैं पलटकर कहता-

आप मेरे यहां पैसे के लिए काम करने आती हैं दीदी या फिर टाइम पास करने. बताइए तो जरा, इस सोसायटी में किस घर की मेड टाटा सूमो से आती है ?

मयूर विहार का वो मेरे लिए बेहद खराब दौर था. घर का एक-एक काम खुद करने की आदत और जिद के आगे हालात ने ऐसा कर दिया था कि उठकर पानी तक नहीं ले सकते थे. हारकर सोसायटी की गेट पर गार्ड से ये कहने के लिए कि कोई काम के लिए आए तो भेजना. तभी ये दीदी वहां खड़ी मिल गई. मैंने पूछा- आप करेंगी दीदी मेरे यहां काम ? अकेले रहता हूं. बस एक बार खाना बनाना होगा और थोड़ी सफाई. कहीं आता-जाता नहीं सो कपड़े न के बराबर ही.

हम मुसलमान हैं भइया, आप मेरे हाथ का बना खाएंगे ? यहां तो कोई काम देने को राजी नहीं हैं.
मुसलमान हैं, तभी तो पूछा..पुलाव तो जोरदार बनाते होंगे और गर आज साथ चलती हैं तो झन्नाटेदार परांठे बनाइएगा न, आलू-भुजिया के साथ.

वो मेरे साथ मेरे घर आ गयी और पूरे तीन घंटे लगाए उसने. घर का हाल देखा तो मुफ्त की सलाह दे दी- हम तो ठीक किए दे रहे हैं भइया, बाकी कुछ चीजें ऐसी है जो लुगाई ही ठीक कर सके है सो जल्दी से ब्याह कर लो.

उसके बाद दीदी के साथ एक नया और बल्कि तार सप्तक ही शुरु हो गया. रोज उनका आना, पहले चाय पीना. फिर खाना क्या बनेगा भइया और पलटकर- आपका क्या मन है बनाने का सीधा जवाब. जो बोलिए. अच्छा तो लौकी की सब्जी और रोटी..और उनका मीठी झिड़की के साथ कहना- क्या भइया, रोज-रोज वही घिया, तोरी..आपको अच्छा खाने का मन नहीं करता, कोफ्ता बना देती हूं. आपको कढी पसंद है तो वही और बनाने लग जाती.

मैं तब तक लेटे-लेटे ही लैपटॉप पर कुछ करने लग जाता और वो बीच में आकर हाथ से लैपटॉप उठाकर मेज पर रख देती- काहे आंख फोड़ते हो भइया, सांस लेने की तो ताकत है नहीं देह में और लगे रहते हो. फिर जमीन पर बैठ जाती.

अपनी बहुओं की कहानी, एक बेटे के प्रेम विवाह करने के किस्से. दो साल की पोती के नखरे..सबकुछ. मेरी फोन की बातचीत से ही समझ लिया था कि मैं अपनी किस दीदी के सबसे ज्यादा करीब हूं, कौन लड़की है जिसकी बात मैं टाल नहीं पाता, किस आदमी के फोन आने पर मैं भड़क जाता हूं. ये कौन प्रोफेसर हैं जो मेरे गार्जियन की तरह हैं. ये जो पत्रकार है वो कितना ईमानदार है..जब वो देखती कि मैं किसी से प्यार से बतिया रहा हं तो कहती- बुला लीजिए न भइया घर, लखनउ वाली बिरयानी खिलाते हैं बनाकर...

होली आती,दीवाली, नवरात्र...और मैं वही लाइन दोहराता- दीदी, मैं कोई पर्व-त्योहार नहीं मनाता, सो बख्शीश नहीं दे सकता. वो कहती- भइया, हम आपसे मांग रहे हैं लेकिन जो हम ईद आपके घर मनावें तो...वैसे एक बात बोले भइया, मेरे घर में न सब कहतीं है कि ऐसा कौन पगलेट है जो तुमही को चाय बनाकर पिआता है, एक दिन आपसे सब मिलना चाहते हैं..हम टीवी पर दिखाए एक बार आपको..पोती के जलमदिन पर आइएगा न इ बार.

तो एक दिन ईद आ ही गई.

भइया, ऐसा है कि हम छुट्टी तो नहीं करेंगे, बाकी एकदम से आठ बजे आवेंगे और आधे घंटे में चले जांगे.
आधे घंटे क्यों, मत ही आइएगा न, हम कुछ कर लेंगे अपने से..
आप न, खूब पता है क्या कर लेंगे, दिनभर में कॉफी मग की बारात सजा देंगे टेबल पर और बहुत होगा तो मैगी सेहरा बांध जाएगा. हम आवेंगे, मना मत करना.

तो वो ईद की सुबह आ ही जाती. आधा लिटर मदर डेरी की फुलक्रीम दूध. कटे हुए ड्राई फ्रूट्स. जामा मस्जिद बाजार की खास भूरे रंग की सेवइयां और पूरे मनोयोग से पूरे आधे घंटे किचन में. उस दिन और कोई बात नहीं करती..और न ये पूछती- ब्रुश किया है आपने, खाना लाउं. बस एक बार आते ही, नहा लेते न भइया और फिर सीधे रसोई.

बाहर निकलती तो पूरी थाली सजाकर खास भोजन. मेरी आदत सुबह खाने की बिल्कुल नहीं है लेकिन बिना कुछ कहे ईद मुबारक दीदी करके शुरु हो जाता. वो माथे पर पल्लू रखकर मेरे सामने तब तक बैठी रहती, जब तक पूरी तरह खा न लूं.

देखिए भइया, आज इतना कुछ है किचन में कि यार-दोस्त भी बुला सकते हैं. ये नहीं कि सब पड़े रहने दीजिएगा और अगले दिन फेंकनी पड़े. हम कल नहीं आवेंगे. बोलिएगा तो अपने लड़के के हाथ कुछ पूरियां भिजवा देंगे..
अरे नहीं दीदी..आप परेशान मत हो.

दीदी की मुझे आदत हो गई थी..52 साल की महिला जिसके घर दो-दो टाटा सूमो, ट्रक, घर की सारी चीजें, जींस लाइए आपकी वॉशिंग मशीन से धोकर ले आउंगी कहते वक्त मेरा उस रहस्य में खो जाना कि आखिर ये मेरे यहां काम क्यों करती है और जितने पैसे मुझसे लेती है, आधी रकम तो मुझ पर ही लुटा देती है, कभी किचन की चीजें, सिलबट्टा, कभी मेरे लिए खाने की चीजें, समझना मेरे लिए मुश्किल था. उस बीमारी और अकेलेपन के दौर में घर का काम कितना पीछे छूट गया था..आप जो ये मुझे रोज-रोज शादी कर देने की नसीहतें दिया करती हैं न, कल अकेले मत आइएगा, साथ अपनी पसंद की लड़की के साथ आइएगा, या तो मत आइएगा..मेरी झल्लाहट के बीच से उनकी फूटती हंसी, कितना कुछ सामान्य तो जो हमने बचपन में मां के आसपास घिरी महिलाओं में देखा था. मैं अक्सर कहता- आप लखनउ की नही,मेरे बचपन के शहर बिहारशरीफ की हैं.

आज छोड़ दीजिए दीदी, कुछ मत कीजिए. बैठिए और चाय पीजिए. ये बताइए, आपकी पोती टीवी देखती है. वो इस बात से हैरान भी होती कि अभी तो फोन पर किसी को कहा- बहुत बिजी हूं, बाद मं बात करता हू..हमसे गपिआने का समय कहां से निकल आया.
सिफत, हमदोनों एक-दूसरे को लेकर हैरान थे कि एक पैसे लेकर आधी रकम मुझ पर ही खर्च करती है और दूसरा पैसे देकर भी काम न करवाकर गप्प करता है, मेरे लिए ही चाय बनाता है. हम दिल्ली शहर के दो ऐसे वाशिंदे थे जिसने अपने भीतर के खालीपन को एक-दूसरे में खोज लिया था.

दीदी एक महीने के लिए लखनउ चली गई. जाते वक्त नसीहतों का पुलिंदा और आंचल से आंख की कोर पोछती हुई. वापस आवेंगे तो लुगाई तो आ ही जाएगी भइया, हम तब काहे आवेंगे रोज-रोज. इस बीच मेरी दोस्त वंदना ने अपनी मेड एक महीने के लिए भेज दिया. जिसे दीदी कहा तो जाते वक्त टोक दिया- हम दीदी नहीं है, मेरा नाम मुन्नी है. खुद ही बता दिया, इस शहर में मेरी दूसरी दीदी नहीं हो सकती.

मयूर विहार का घर छूट रहा था और दीदी फफक-फफककर रो रही थी..भइया, आप जहां जा रहे हैं, हम बस से आ सकते हैं ?

आप जितना बस में खर्च करेगी, उतने पैसे मैं दूंगा भी नहीं.

कोई बात नहीं. पास बनवा लेंगे. आप हमरा काम छोड़वा देते भइया, बाकी यहीं रहते.

नहीं दीदी, कॉलेज बहुत दूर है न यहां से.

मयूर विहार आवेंगे आप तो बस एक फोन कर दीजिएगा, जहां कहेंगे हम वहीं आ जाएंगे.
ठीक है दीदी.
जाते वक्त मैंने सारा हिसाब कर दिया. वो एक पैसे लेने के लिए तैयार न थी.
जाते-जाते सितम काहे ढाह रहे हो भइया ?
बहुत मनाने पर ले लिया.
गेट बंद करता कि वापस आ गयी और हाथ में मचोड़कर सौ के नोट पकड़ा दिए-
आपके लिए चॉकलेट लाना भूल गई थी.

मयूर विहार छूटा, दीदी का नियमित फोन आना जारी रहा, हाल-चाल, तबीयत..लेख, तहलका,टीवी शो..अगली बार टीवी पर कब आवेंगे, सबकी खोज खबर..हमरी बहू पूछती रहती है आपके बारे में- आपके भइया तो धोखेबाज निकले अम्मी, बोलकर आए नहीं कभी घर ?

कहां गया मेड,कामवाली,मुस्लिम औरत, संभलकर विनीतजी, आजकल जमाना खराब है, किसी का भरोसा नहीं की नसीहतें...सब कबाड़ में तभी चले गए थे.याद रह गया तो बस इतना कि सब काम करनेवाली दीदी नहीं होती और कभी न ब्रेकफास्ट करनेवाला ये शख्स ईद की सुबह हचड़कर ब्रेकफास्ट कर सकता है और बाहर प्लीज डॉन्ट नॉक की चिट लगाकर देर दोपहर तक सो सकता है और वो भी बिना कोई दवाई लिए.

क्षोभ- चलते-चलते दीदी के साथ एक तस्वीर ली थी. कुछ ही महीने बाद मोबाईल चोरी हो गया तो तस्वीर भी गई और उनका नंबर भी. बस गूगल इमेज से हमने उनकी शक्ल मिलान करने की कोशिश की है.
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3 Response to 'और मैं जो आपके घर आकर ईद मनाउं तो ?'
  1. Bhavna Mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2014/07/blog-post_29.html?showComment=1406626627109#c3719804112872428087'> 29 जुलाई 2014 को 3:07 pm

    कुछ रिश्तों की कैफ़ियत ऐसी ही होती है, अपनी मर्ज़ी से बनते हैं, एक छोटे से अंतराल के लिए.. और याद बनकर बस जाते हैं. बहुत अच्छी पोस्ट है

     

  2. Manish Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2014/07/blog-post_29.html?showComment=1406649927559#c8486987158236019463'> 29 जुलाई 2014 को 9:35 pm

    इतनी भावपूर्ण कहानी हम सभी के बीच रखने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर

     

  3. पंकज मिश्र
    http://taanabaana.blogspot.com/2014/07/blog-post_29.html?showComment=1406742512039#c452262658318287808'> 30 जुलाई 2014 को 11:18 pm

    बहुत सुंदर विनीत जी
    इस रिश्ते को जिस खूबसूरती से आपने जिया, वैसे लिखा भी।

     

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