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लड़की के साथ यौन हिंसा और बलात्कार एक बात है और दलित लड़की के साथ बलात्कार दूसरी बात है. ये विभाजन स्पष्ट रूप से आपको हरियाणा में लगातार हो रही घटना के मामले में दिख जाएगा. दलित लड़कियां बलात्कारियों की शिकार होने के साथ उस समझ और जाति की भी शिकार हो जाती है जिसमें दलित शोषण के अन्तर्गत ये सब स्वाभाविक मान लिया जाता है. नहीं तो क्या कारण है कि जिन विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, कॉलेजों और मंचों से स्त्री हिंसा के नाम पर हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आती है, हरियाणा में दलित लड़कियों के साथ हो रही एक के बाद एक घटना हमें सुलगाने के बजाए इस जुमले की तरफ धकेल देती है- हरियाणा में तो ये सब कॉमन है. आप बनारस आगाह करने जा सकते हैं, कभी हरियाणा नहीं..
Photo: 23 मार्च 2014 को हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव से चार दलित लड़कियों को दबंग जाट बिरादरी के लोगों ने अपहरण कर लिया और फिर लगातार उनके साथ दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार करते रहे. इस घटना के विरोध में अप्रैल से ही लोग जंतर-मंतर पर बैठे हैं, लड़कियों का पीड़ित परिवार वापस भगाणा लौटना नहीं चाहते. उन्हें डर है कि कभी भी उनके साथ कुछ भी हो सकता है. लेकिन
ये वही जंतर-मंतर का इलाका है जहां 16 दिसंबर की घटना को लेकर शहर का मध्यवर्ग उमड़ पड़ा था लेकिन आज वो पूरी तरह नदारद था. कुछेक लोगों को छोड़ दें तो आंदेलन और जला दो मिटा दो के नारे लगानेवाले चमकीले चेहरे दूर-दूर तक दिखाई न दिए. असल में मध्यवर्ग किसी भी आंदोलन को चमकीली शक्ल में तब्दील होने तक इंतजार करता है. अगर मुद्दे चमकीले हो गए तो उसमे शामिल हो जाता है और जो मुद्दे बेहद सादे और जमीनी स्तर से जुड़े हैं, वो उनके मतलब का नहीं होता. हरियाणा में एक के बाद एक दलित स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, दुर्भाग्य से वो मध्यवर्ग के हिसाब से चमकीली नहीं है नहीं तो इसी जंतर-मंतर पर हमने बिंदास टीवी औऱ रेडियो मिर्ची द्वारा प्रायोजित स्लट वॉक में हजारों की भीड़ देखी थी और एक से एक चैनल और अखबार के लोग कवरेज के लिए आए थे.

23 मार्च 2014 को हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव से चार दलित लड़कियों को दबंग जाट बिरादरी के लोगों ने अपहरण कर लिया और फिर लगातार उनके साथ दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार करते रहे. इस घटना के विरोध में अप्रैल से ही लोग जंतर-मंतर पर बैठे हैं, लड़कियों का पीड़ित परिवार वापस भगाणा लौटना नहीं चाहते. उन्हें डर है कि कभी भी उनके साथ कुछ भी हो सकता है. लेकिन
ये वही जंतर-मंतर का इलाका है जहां 16 दिसंबर की घटना को लेकर शहर का मध्यवर्ग उमड़ पड़ा था लेकिन आज वो पूरी तरह नदारद था. कुछेक लोगों को छोड़ दें तो आंदेलन और जला दो मिटा दो के नारे लगानेवाले चमकीले चेहरे दूर-दूर तक दिखाई न दिए. असल में मध्यवर्ग किसी भी आंदोलन को चमकीली शक्ल में तब्दील होने तक इंतजार करता है. अगर मुद्दे चमकीले हो गए तो उसमे शामिल हो जाता है और जो मुद्दे बेहद सादे और जमीनी स्तर से जुड़े हैं, वो उनके मतलब का नहीं होता. हरियाणा में एक के बाद एक दलित स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, दुर्भाग्य से वो मध्यवर्ग के हिसाब से चमकीली नहीं है नहीं तो इसी जंतर-मंतर पर हमने बिंदास टीवी औऱ रेडियो मिर्ची द्वारा प्रायोजित स्लट वॉक में हजारों की भीड़ देखी थी और एक से एक चैनल और अखबार के लोग कवरेज के लिए आए थे.

Photo: लड़की के साथ यौन हिंसा और बलात्कार एक बात है और दलित लड़की के साथ बलात्कार दूसरी बात है. ये विभाजन स्पष्ट रूप से आपको हरियाणा में लगातार हो रही घटना के मामले में दिख जाएगा. दलित लड़कियां बलात्कारियों की शिकार होने के साथ उस समझ और जाति की भी शिकार हो जाती है जिसमें दलित शोषण के अन्तर्गत ये सब स्वाभाविक मान लिया जाता है. नहीं तो क्या कारण है कि जिन विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, कॉलेजों और मंचों से स्त्री हिंसा के नाम पर हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आती है, हरियाणा में दलित लड़कियों के साथ हो रही एक के बाद एक घटना हमें सुलगाने के बजाए इस जुमले की तरफ धकेल देती है- हरियाणा में तो ये सब कॉमन है. आप बनारस आगाह करने जा सकते हैं, कभी हरियाणा नहीं..

भगाणा( हरियाणा ) में चार दलित लड़कियों के साथ हुए बलात्कार को घटना कहकर चर्चा करना बेमानी होगी. ये दरअसल हरियाणा में सालों से दलित स्त्रियों के साथ चल रहे बलात्कार वर्कशॉप का एक घिनौना नमूना है. जब आप इसे घटना कहते हैं तो इसके साथ सालों से चल रहे उस वर्कशॉप पर पर्दा पड़ जाता है जहां यह बेहद ही मामूली ढंग से देखा जाता है. यकीन न हो तो अखबार की पुरानी फाइलें उठाकर देख लें, दलित स्त्रियों/लड़कियों के साथ बलात्कार की पूरी सीरिज मिलेगी और दबंग गुंडे दोषियों के खिलाफ होनेवाली कार्रवाई पर गौर करेंगे तो लगेगा कि प्रशासन और बलात्कारियों की जुबान में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है.

8 मई 2010 को हमलोग मिर्चपुर( हरियाणा) में 12 वीं कक्षा में पढ़ रही सुमन के खाक हो चुके कमरे में थे. सुमन की सिविक्स की किताब के पन्ने को समेटते हुए जिसमे कि हमारा संविधान का अध्याय छपा था, जनसत्ता के पत्रकार अरविंद शेष की दो अलग-अलग आंखे अलग-अलग भाव व्यक्त कर रहे थे, एक में गाढ़े आंसू थे और दूसरे में धधका देनेवाला गुस्सा.

21 अप्रैल 2010 को मिर्चपुर के दबंग जाति के लोगों ने दलितों के कुल 18 घरों में आग लगा दी थी. एक पैर से लाचार दलित लड़की सुमन के साथ उन्होंने दुष्कर्म किया और बाहर से कुंडी लगाकर जलती गैस सिलेंडर बाहर से फेंक दिया. सुमन कमरे में तड़प-तड़पकर मर गयी. बाहर के कमरे में पड़े उनके पिता पर हमला किया गया और आग लगा दी गई. दोनों बेटी-बाप की मौत हो गई. जले घर के बाहर लड़की की तख्ती पर सुमन की दीदी ने जब पूरा हाल हमें सुनाया तो लगा हम किस मुल्क में रहते हैं और दलित विमर्श के नाम पर विश्वविद्यालयों में आखिर कर क्या रहे हैं ? पता नहीं हम कौन सी शोध प्रविधि पर बहस कर रहे होते हैं लेकिन यहां तो दलितों को सीधे जिंदा जला दिया जाता है.

हमें महा खाप पंचायत में किसी तरह का सवाल नहीं करने दिया गया. उल्टे चारों तरफ से घेर लिया गया कि तुम दिल्लीवाले पत्रकार हमें तालिबानी बोलते हो..सबकी जान अटक गयी थी जबकि वहीं दैनिक भास्कर, अमर उजाला और बाकी के अखबार के प्रतिनिधि पत्रकार आराम से नाश्ते के साथ खाप के समर्थमन में और सुमन के साथ जो हुआ, वो कोई गुनाह न होकर दलित की ही गलती की बात सुन रहे थे. बाद में मिर्चपुर की इस घटना के साथ जो औऱ जैसा व्यवहार हुआ, हमें तभी अंदाजा लग गया कि हरियाणा में दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है

आप करते रहिए इस बात पर थै-थै कि अस्मितामूलक विमर्श के तहत अब दलित विमर्श-स्त्री विमर्श और साहित्य पाठ्यक्रम का हिस्सा हो गया. मुझे तो ऐसे पाठ्यक्रम पर बेहद अफसोस होता है जो खुलेआम सड़कों पर होनेवाले संघर्ष, बहस और मुठभेड को एसाइनमेंट, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन और इन्टरनल एस्सेमेंट का हिस्सा बनाकर इसकी धार को मार देने का काम करते हैं. देशभर में होनेवाले सेमिनार सर्टिफिकेट बटोरने के धत्कर्म बनकर रह जाते हैं. ये सिलेबस विमर्श कम सड़कों पर लड़ी जानेवाली हक की लड़ाई की मॉर्चरी है, शवगृह है.
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1 Response to 'हरियाणा में जारी है दलित स्त्रियों के बलात्कार की वर्कशॉप'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2014/05/blog-post.html?showComment=1399863131474#c636345891580023241'> 12 मई 2014 को 8:22 am

    अफ़सोस है कि यह सब हो रहा है!

     

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