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आपका न्यजू एंकर पूरे नवरात्र तक उसी तरह सज-संवरकर माता रानी पर स्पेशल प्रोग्राम लेकर आता रहा, जिस तैयारी से वो किसी मंदिर के आगे मत्था टेकने जाता या जाती. उनमे से कुछ ने तो सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीर पहले या बाद में साझा भी की. एक बार जब इस बहरुपिया पोशाक में सज गए तो फिर भाषा तो भक्तगण और श्रद्धालु की तरह तो अपने आप निकलने लग जाती है...और फिर पैनल में बाबा होंगे कि समाज वैज्ञानिक ये भी अलग से समझना नहीं होता है. इसका सीधा मतलब है कि वो ऐसे कार्यक्रम और इस हुलिए में उसकी प्रस्तुति इसलिए नहीं करते कि आप और हम ऐसा चाहते हैं. उनका खुद का भी यकीन इन सबमे होता है. नहीं तो एक तर्क तो साफ है न कि चैनल उसे ऐसा करने पर ही बने रहने देगा तो रोजी-रोटी पर लात मारकर कैसे प्रगतिशील बनें लेकिन सोशल मीडिया पर अगर ऐसा करने के पीछे कोई मजबूरी नहीं है तो भी कर रहे हैं इसका मतलब है कि वो इन सब पर यकीन करते हुए ऐसा ही करना चाहते हैं. लेकिन

कल को ऐसे ही कार्यक्रमों का पाखंड़ फैलाए जाने, अंधविश्वास और लोगों में वैज्ञानिक सोच को ध्वस्त करके अंधश्रद्धा का प्रसार के आरोप लगाकर विरोध होते हैं तो आप दर्शकों का इस्तेमाल इस रुप में होगा कि जब लोग देखना चाहते हैं तो हम क्या कर सकते हैं ? आप अपने उन तमाम चहेते टीवी एंकर, रिपोर्टरों पर नजर रखिए, उनकी फेसबुक वॉल और ट्विटर पर नजर बनाए रखिए, कल को काम आएगा ये पूछने में कि टीवी स्क्रीन पर तो पाखंड फैलाना आपकी मजबूरी है क्योंकि उसका संबंध चैनल की बैलेंस शीट से है लेकिन सोशल मीडिया पर उसी तरह कंजक पूजते-पुजवाते, धर्म के नाम पर लड़की बच्ची को भावनात्मक रुप से कुंद करने मरे हुए चमगादड़ों के माफिक रक्षा कवच लपेटने और तिलक लगवाने के पहले रुमाल रखने का जो कर्मकांड किया और बाकायदा उसकी तस्वीर चमका रहे हैं, उसके पीछे हम जैसों की इच्छा का क्या संबंध है ? कुछ नहीं तो एक सवाल तो बनता ही है कि क्या हम देश के धुरंधर एंकरों, रिपोर्टरों और मीडियाकर्मियों को इसी तरह बिना-सिर पैर के क्रियाकर्मों और पाखंड़ में फंसा देखना चाहते हैं या फिर उम्मीद करते हैं कि वो जो जैसा है, उससे अलग और बेहतर समाज के बारे में एक विकल्प दे. ये संभव है कि बेहद भारी-भरकम बात और कामना हो गयी लेकिन यही सवाल जब समाज के सिरे से उठाए जाएंगे तो ये पाखंड़ी मीडियाकर्मी आप दर्शकों को अंधविश्वासी, पिछड़ा और गंवार बताकर कॉलर, आंचल तानकर खड़े हो जाएंगे और प्रोग्रेसिव मसीहा बनकर पूरी बहस पर काबिज हो जाएंगे.

पिछले दिनों एक मीडिया सेमिनार में जब लंच के ठीक पहले हस्ताक्षर के लिए कागज घुमाए जा रहे थे और वो कागज जब मुझ तक आया तो मैंने भी नाम, मेल आइडी के साथ हस्ताक्षर कर दिया.. लंच ब्रेक होते ही कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और मजे लेने शुरु कर दिए- क्या विनीतजी, आपका भी नवरात्र चल रहा है, फेसबुक पर तो बड़े क्रांतिकारी बने फिरते हैं ? मैंने कहा, नहीं तो..आगे उनका जवाब था तो व्रतवाली थाली पर साइन कैसे कर दिए ? मैंने स्थिति साफ करते हुए कहा कि मैं तो उसे हाजिरी समझ रहा था और सच पूछिए तो यहां तक मैं सोच भी नहीं पाया कि किसी मीडिया सेमिनार में अलग से व्रत की थाली का इंतजाम होगा औऱ लोगों की धार्मिक भावनाओं का इस तरह का ख्याल रखा जाएगा..

नोएडा फिल्म सिटी चले जाइए, दोपहर से लेकर शाम तक मीडियाकर्मियों की बातों पर गौर कीजिए, विश्वविद्यालय चले जाइए..तथाकथित भविष्य गढ़नेवाले शिक्षकों के बीच थोड़ा वक्त बिताइए..बातचीत का बड़ा हिस्सा नवरात्र, खाने के परहेज और फलां-फलां चीजों की मनाही पर केंद्रित होगी..जैसे अचानक से शहर को किसी संक्रामक रोग ने घेर लिया हो जिसमे एक ही साथ दर्जनभर चीजें न खाने की मनाही हो और उससे दुगुनी दो दर्जन चीजें खाने पर जोर हो. इन दोनों सर्किट में सबसे ज्यादा प्रोग्रेसिव, प्रो ह्यूमन और भविष्य की दशा-दिशा समझने-समझाने के दावे किए जाते हैं लेकिन करीब से देखिए, उनकी पूरी जीवन पद्धति उन्हीं पाखंड़ों, घोर असहिष्णु और भाग्यवादी विधानों में उलझा है जिसके लिए वो कम पढ़े-लिखे, निरक्षर लोगों को कोसते आए हैं.

ऐसे में होता क्या है ? टीवी स्क्रीन पर वो खबरें, स्पेशल प्रोग्राम और हार्ड कोर न्यूज में भी अंध आस्था और पाखंड के रेशे तैरते हैं जिन पर कि मीडियाकर्मियों को यकीन है. मुझे नहीं पता कि ये मीडियाकर्मी पूरे नवरात्र के दौरान क्या न खाना है के साथ-साथ क्या-क्या खबर नहीं चलानी है का भी निषेध करते हों. इधर अकादमिक दुनिया का बड़ा हिस्सा उन्हीं बेसिर-पैर की मान्यताओं के आगे हथियार डालकर उसे आगे बढ़ाता नजर आता है, जिसके जाले साफ करने के लिए साल में उन्हें लाखों रुपये दिए जाते हैं. उन्हें आम लोगों के टैक्स के पैसे कतई इस बात के लिए नहीं दिए जाते कि वो छात्रों के बीच ऐसे पाखंड़ का प्रसार करें, उसके प्रति विश्वास को बढ़ाएं, ये काम तो देश के हजारों खोमचे टाइप के मंदिरों के साथ-साथ अन्डर्वल्ड की कोठियों की तरह बने भव्य मंदिर कर ही रहे हैं. उनका काम इससे अलग है और ये बताना भी कि इसका हमारे जीवन, पर्यावरण, सोचने के तरीके, संसाधनों के दुरुपयोग से किस तरह है.

लेकिन मीडिया और अकादमिक दुनिया दोनों मिलकर इस सिरे से बात न करके उन्हीं जालों को विस्तार देते हैं जो आगे चलकर धर्म और आस्था के नाम पर एक ऐसे समाज को पनपने देने में सहयोग कर रहे हैं जिसके भीतर हम जैसों को तो छोड़िए खुद उनके जीने लायक भी नहीं रह जाएगा..और ये संकट सिर्फ वैचारिकी का नहीं है. िइसका संबंध ठोस रुप से हमारे जीने की बुनियादी जरुरतों और प्राकृतिक साधनों से है. हवा में पटाखे जलाने, रंगों और बिजली का अत्यधिक इस्तेमाल करने से जो जहरीली गैस, हवा और ध्वनि का प्रसार हो रहा है, क्या उसका असर सिर्फ नास्तिकों पर होगा और जो श्रद्धा में आकंठ डूबे हैं, उन्हें प्रदूषण छोड़ देगा ? आज जो ये चैनलों के लोग फेसबुक पर रावण चलने-जलाने की तस्वीरें चमका रहे हैं, उन्हें तो अभी लग रहा है कि लोगों के बीच सिलेब्रेटी होने की ठसक पैदा कर रहे हैं कि वो कितने करीब से चीजों को देख पा रहे हैं लेकिन असल में वो कितने जड़ और दुर्भाग्य से ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिस पर सिर्फ पेट भरने की जिम्मेदारी नहीं है, भूखे पेट के पक्ष से भी सोचने का है..लेकिन नहीं, वो उनके भूख के बारे में सोचेंगे, इससे पहले उनके बीच की शुद्ध हवा, पानी और परिवेश छीन ले रहे हैं.

मैं झारखंड़ से हूं. पांच साल रांची के संत जेवियर्स कॉलेज में पढ़ते हुए देर रात झुंड़ में आए उन्हीं आदिवासियों, कलाकारों को उनके घर तक छोड़ने का जब-तब मौका मिलता रहा जिन्हें बेहद पिछड़ा करार देकर दिल्ली में देखता हूं लाखों रुपये सेमिनार पर फूंके जाते हैं. मुझे ऐसे सेमिनारों के कर्णधारों पर बेहद ही अफसोस और कभी-कभी घृणा भी होती है कि ये सच से कितने दूर होकर चीजों को देख रहे हैं. त्योहार, परंपरा और संस्कृति के नाम पर यही आदिवासी अपने जंगल, जमीन और परिवेश को पर्यावरण की दृष्टि से कितने वैज्ञानिक ढंग से सोचते हैं, ये हमारे आपके-बूते की चीज नहीं है.. उनके त्याहारों में ये शामिल ही है कि सामान्य दिनों के मुकाबले प्रकृति और और कैसे जीवन का जरुरी हिस्सा के रुप में देखा-समझा जाए. हमारे अधिकांश त्योहार भी पौराणिक मान्यताओं और विश्वासों की बहस से थोड़ी देर अलगाकर देखें तो पर्यावरण और साफ-सुथरे वातावरण को विस्तार देने का ही थी लेकिन उन सबसे काटकर अब ये सिर्फ और सिर्फ प्रदूषण पैदा करने की फैक्ट्री में तब्दील होता चला गया.

हम मीडिया की कक्षाओं में अक्सर पढ़ाते हैं, अब खबरों की प्रकृति तेजी से बदल रही है. पहले की तरह नहीं है कि कोई खेल की खबर है तो वो आखिर तक खेल की ही रहेगी..उसमे थोड़े ही वक्त में बिजनेस और फिर राजनीति शामिल हो जाएगी और इस तरह वो हाइब्रिड बीट की खबर हो जाएगी. चैनल बाकी खबरों के साथ ऐसा करके दिखाते भी हैं लेकिन इस तरह के त्योहारों और धार्मिक पाखंड़ों में वो एकतरफा ही बने रहते हैं. अघर वो ऐसा न करके खबर की शिफ्टिंग करें, होली-दीवाली पर रंग और पटाखे की खपत के आंकड़े देने के साथ-साथ बाजार-दूकान सजने के पहले दिन से प्रदूषण बढ़ने की खबर, शहर को नरक और कूड़ाघर में तब्दील होने की खबर दें तो यकीन मानिए वो बहुत ही मजबूती से लोगों के बीच ये राय कायम कर सकेंगे कि धर्म के नाम पर हम जो कुछ भी कर रहे हैं दरअसल वो हम अपने लिए ही अर्थी साजने का काम कर रहे हैं..मतलब ये कि मीडिया में जो पर्यावरण कभी गंभीर मुद्दा नहीं रहा, वो ऐसे मौके पर एक अनिवार्य रिपोर्टिंग का हिस्सा बनकर सामने आ सकता है..लेकिन नहीं, हम उम्मीद किससे कर रहे हैं..उन्हीं मीडियाकर्मियों से जो बाबाओं को चैनल पर बुलाते हैं तो टीवी शो के लिए लेकिन लगे हाथ पूजा, सगाई और फ्लैट खरीदने के शुभ दिन भी पूछ लेते हैं और वाशरुम ले जाने के बहाने हाथ भी दिखला लेते हैं..
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10 Response to 'जब आपका न्यूजरुम माता की चौकी में तब्दील हो जाता है'
  1. दिनेशराय द्विवेदी
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381695795096#c2376492261831578863'> 14 अक्तूबर 2013 को 1:53 am

    सही आलेख है और सही समय पर है।

     

  2. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381710971905#c1869429673267238194'> 14 अक्तूबर 2013 को 6:06 am

    करवा चौथ भी आएगा

     

  3. prakash
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381714895981#c3434284047079965249'> 14 अक्तूबर 2013 को 7:11 am

    Bahut hi jaruri mudde ke prari dhyan khicha hai apke alekh ne. Jagriti layegi , jarur.

     

  4. prakash
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381714984077#c7184894177311562530'> 14 अक्तूबर 2013 को 7:13 am

    Bahut hi jaruri mudde ke prari dhyan khicha hai apke alekh ne. Jagriti layegi , jarur.

     

  5. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381723903918#c4316929494765992052'> 14 अक्तूबर 2013 को 9:41 am

    जो चाहते हैं, वही दिखता है,
    नेतृत्व नहीं, बाज़ार सा बिकता है।

     

  6. नीरज पाल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381850126348#c4741861966507932414'> 15 अक्तूबर 2013 को 8:45 pm

    इस पोस्ट की चर्चा, बुधवार, दिनांक :-16/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -26 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....नीरज पाल।

     

  7. नीरज पाल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381929235326#c8632576126748394179'> 16 अक्तूबर 2013 को 6:43 pm

    त्रुटी के लिए क्षमाप्रार्थी, यह चर्चा अंक 27 में शुक्रवार को शामिल की गयी है।

     

  8. दीपक बाबा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381937893438#c8250938061758051963'> 16 अक्तूबर 2013 को 9:08 pm

    आज का इंसान (जी बिलकुल मानुष से अलग इंसानियत वाला इंसान) मन्नत, मुरादों और ख्वाईशों के बीच दोहरी जिन्दगी जी रहा है

     

  9. दीपक बाबा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381937948976#c6214643749403437476'> 16 अक्तूबर 2013 को 9:09 pm

    @ नीरज पाल
    त्रुटी के लिए क्षमाप्रार्थी, यह चर्चा अंक 27


    ..... जनाब जो त्रुटी हुई है ... उसको बोलते तो सही.

     

  10. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/10/blog-post_14.html?showComment=1381997653481#c1388055640002592633'> 17 अक्तूबर 2013 को 1:44 pm

    सुन्दर लेख।

     

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