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क्या यार, डा मिलानो, क्लार्क्स, हाइ डिजायन से इतने दहशत में आ गए कि एरिक हॉब्सबाम, नोम चोम्सकी और एडवर्ड सईद जैसे लोगों की किताबें इस तरह लुटा रहे हो ? क्यों वैसे आम दिनों में बिना डिस्काउंट के इन्हें नहीं खरीदेगा कोई ?

सी, बेसिकली दे ऑर शटिंग डाउन दिस शॉप, दे विल नॉट टेल यू बट द फैक्ट इज कि रिलांयस इज नो मोर इन्टरेस्टेड इन बुक्स बिजनेस. मे बी दे ऑर नॉट गेटिंग द प्रॉफिट लाइक पेट्रोलियम ऑर मोबाइल इन्डस्ट्री..ही ही ही ही..हें,हें,हें. सर्विस ब्ऑय की तरफ फेंके गए मेरे सवाल और मजाक को एक सरदारजी ने तुरंत ही रिस्पांड किया..उनकी गर्लफ्रैंड या पत्नी( कन्फर्म नहीं) इंग्लिश फिक्शन वाले सेक्शन में पूरी तरह डूबी हुई थी और सरदारजी ऐंवे टाइप से विंडो शॉपिंग की मुद्रा में चट रहे थे.इसी बीच मेरे वाक्य से लगा कि चलो कोई मुल्ला मिला है जिसके साथ टाइमपास किया जा सकता है..लेकिन खजाने में लगे हाथ,निगाहें और और मन भला कहां सरदारजी को बोर होने से बचाते सो मैंने मुस्कारते हुए थैंक्स ए लॉट कहा और बाकी शहरीदां के अंदाज में एक्स क्यूज मी कहकर आगे बढ़ गया..


इस बीच सर्विस ब्ऑय रैपिडेक्स से अंग्रेजी की पूरी ताकत समेटते हुए मेरी तरफ बढ़ा और कहा- सर, इट इज गुड चांस टू बाई बुक्स..यू कैन लीव टीशर्ट और जींस बट यू शुटनॉट मिस दिस ऑपौरचूनिटी..अच्छा, मैंने मुस्कराते हुए कहा और उस सजे-धजे कंपनी की ड्रेस में अपने दुधिया मालदाह बोलकर रोज राह चलते मेरी हाथ खींच लेनेवाले खगड़िया के भइया की छवी खोजने लगा.( उन पर विस्तार से फिर कभी)..कहां के हो जी..लगा कि ये बताने में संकोच करेगा इससे पहले इन्हें बता दो कि मैं कहां से हूं सो पहले मैंने ही बताया. वो मेरे काफी करीब आ गया और धीरे से कहा- अब अपने तरफ के हैं तो सब किलियरे कर देते हैं आपको..असल में इ किताब-उताब का धंधा इ मॉल में चलेवाला नहीं है..एतना भाड़ा-बुत्ता खर्चा करके अदमी फेमिली के साथ आता है त खाएगा-पिएगा,घूमेगा-फिरेगा कि किताबे में आंख फोड़ेगा..नौकरी-चाकरी के चक्कर में तो इ सब किया ही है जवानी में..अब शौख-मौज के समय में भी इहै सब..मैं समझ गया कि ये पूरी बतरस के मूड में है और ऐसी हाइ-फाइ जगह में अंग्रेजी के बाद लोग सीधे वज्जिका,मगही और कुडुक-मुंडारी पर उतर आते हैं तो हमारे साथ के कुछ लोग इसे इंडियन चूतियापा कहते हैं. खैर,

नोम चोमस्की,एडवर्ड सईद,रॉबिन जेफ्री की सेल्फ में रखी किताबें देखने के बाद मैं इस शख्स के साथ और ज्यादा बातचीत नहीं कर सकता था..हमारे पास मात्र 45 मिनट थे और फिर शीप ऑफ थीसिस के लिए तेजी से हॉल के अंदर भागना था..इस बीच जितनी किताबें छांटी-खरीदी जा सकती थी, जुट गए. बहुत सारी ऐसी किताबें जिसके लिए मैं लंबे समय तक इंतजार करता रहा कि फ्लिपकार्ट पर थोड़ी कीमतें खिसके, कुछ तो उपलब्ध नहीं है के खाते में थी. मैं तो सिर्फ इस बात से खुश और हैरान हो रहा था कि एम्बीएंस मॉल,गुंडगांव में जहां चारों तरह जींस,जूते,एपेरल पर लगी भारी सेल के बड़े-बड़े पोसटर के बीच चीजें दिखाई नहीं दे रही है, उन सबके बीच मैं इन लेखकों की किताबें साफ-साफ देख सकूंगा. दूसरा कि जो किताबें मशहूर,टिपिकल बुक शॉप तक में कई बार नहीं मिलती, वो यहां हो सकती है ?

हम जैसे पाठकों के लिए जिसकी फिक्शन में न के बराबर दिलचस्पी है, सिर्फ थीआरि और क्रिटिसिज्म पसंद है, कई बार बहुत राहत और फायदे मिल जाते हैं..खासकर इन चमकीली जगहों पर. अधिकांश लोग फिक्शन, जीवन सुधार टाइप, चेतन भगत और उनके टाइप के लेखकों की किताबों के आगे लिथड़ रहे थे जबकि पॉलिटी, हिस्ट्री, बिजनेस एंड इकॉनमी की सेल्फ के आगे सन्नाटा था. देखना शुरु किया तो लगा कि इस तरह से एक-एक किताब देखने से बेहतर है कि जाकर काउंटर पर सीधे कहूं- इस पूरी सेल्फ की बोली लगा दूं, एकमुश्त कितने में दे सकते हैं सब ? भले इस पागलपन में मेरा बैंक अकाउंट हांफने लगे और आखिर में जाकर दम भी तोड़ दे..लेकिन मुझे पर भयानक नशा सा छा गया था..यार एडवर्ड सईद की किताब कल्चर एंड एम्पीयरलिज्म सत्तर प्रतिशत छूट पर कोई कैसे बेच सकता है और जब बेच रहा है तो बाकी के चारों तरफ घिरे लोग कद्दू छिल रहे हैं खड़े होकर इतनी देर से..पहले भी ऐसे ही कई छिलकर गए होंगे..लगा, इसी तरह की दूकान अगर डीयू या जेएनयू कैंपस के आसपास होती तो चेतन भगत टाइप की किताबें तो गंधा रही होती जबकि इन सेक्शन के आगे मेला लगा होता और सेल्फ पर किताबें नहीं एक इत्मिनान सी पंक्ति लेटी होती- इट्स ओवर नाउ, ले गए सब कद्रदान. क्या स्पेस के बदल जाने के हिसाब से रीडिंग कल्चर को समझा जा सकता है ?

आमतौर पर कमलानगर और बहुत हुआ तो कनॉट प्लेस को ही हम जैसे लोग शॉपिंग के लिए अंतिम ऐशगाह मानकर उसी तरह चक्कर लगाते रहते हैं जैसे कि जीवन केन्द्र में पानी और टेलीफोन बिल जमा करने के लिए..उसके लिए एम्बीएंस मॉल की ये दूकान किसी बड़े झटके से कम नहीं थी..ये उसी तरह का झटका था जब मेरा भूतपूर्व दोस्त राहुल( राहुल सिंह,युवा आलोचक) प्रिया सिनेमावाली ओम बुक्स में लगी सेल में कुकरी शो के किताबों के बीच अनिया लुंबा कि पोस्ट कलोनियलिज्म की किताबें निकालकर थै-थै करने लग जाता था और मैं उसी कुकरी शो की किताबें पलटते हुए भाभी को दें कि दीदी को..ठगा सा हो जाता..बहरहाल

रॉबिन जेफ्री की सेलफोन नेशन देखकर हम जिस रिलांयस की इस शॉप में घुसे थे, हमें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वहां मैं इस कदर रम जाउंगा कि अपने दर्जनों दोस्तों की फेसबुक टाइमलाइन पर द शिप ऑफ थीसियस के लिए "ऑफ्टर वॉचिंग दिस फिल्म,आय एम स्पीचलेस" पढ़ने के बावजूद उसे छोड़ सकते हैं.इन किताबों के बीच अपने काम की किताबें खोजने के लिए हम पीवीआर की मंहगी टिकट किसी को दान कर सकते हैं..हम तो बस फिल्म देखने आए थे यहां और ये सोचकर कि आज की शाम की ये एक उपलब्धि होगी लेकिन बुरा मत मानिएगा, हमें फिल्म के पहले ही जो खुशी मिल रही थी..उसे हम कई दिनों तक सहेजकर रखेंगे..मैं सालों से फोन और चैट के जरिए बात करते रहे पीडी यानी मशहूर मर्मस्पर्शी पोस्ट लिखनेवाले ब्लॉग प्रशांत प्रियदर्शी से मिल रहा था, पंकज से पहले छोटी सी मुलाकात थी और दिवांशु बहुत प्यारा लगते हुए भी आधे घंटे में ही हाय-बाय तक करना पड़ गया था..मुझ पर नजरें गड़ाए थे, एकटक मुझे देख रहे थे बल्कि पीडी ने तो यां तक कहा- तुम्हारे चेहरे पर से खुशी फूट-फूटकर बाहर निकल रही है..तुम बातचीत में कभी भी इतने खुश नजर नहीं आए..मैं बार-बार इसके लिए इन तीनों को बारी-बारी से क्रेडिट दे रहा था और उनकी खुशी दोहरी हो रही थी कि चलो जो बंदा गुंडगांव में घुसते ही कार्पोरेट सिटी, ओटोवाले की चिरकुटई और वेवजह की शो ऑफ के कारण थोड़ा उदास हो गया था, शाम होते ही इतना खुश हो गया और ये खुशी आखिर तक बनी रही.

फिल्म तो बेहतरीन थी ही..काफी देर तक जैसे भीतर कुछ जम जाने जैसी चीज समा गई हो लेकिन टिकट की कीमत पर हम थोड़े इस खुशी पर सौ प्रतिशत खुशी की मुहर लगाने में ना-नुकुर कर रहे थे कि किताबों पर मिली छूट ने इस कचोट को खत्म कर दिया..मुझे नहीं पता कि ये कितना पॉलिटिकली करेक्ट होगा कि भकुआ की तरह मैं इस छूट को सिलेब्रेट कर रहा हूं लेकिन हां एक पाठक-दर्शक,एक उपभोक्ता और एक संभले हुए खरीदार, मिडिल क्लास के इस बच्चे के लिए जश्न की शाम तो थी ही न..बस ये है कि स्टडी टेबल पर इन किताबों को देख रहा हूं तो लग रहा है- एडवर्ड,नोम चोमस्की की किताबों पर 70 % छूट के चिपके बड़े स्टीगर अच्छे नहीं लग रहे, इसे जितनी जल्दी हो सके, उखाड़ दूं..ये बिना सेल के भी उतने ही प्यारे और जरुरी लगते हैं.
  
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2 Response to 'जाइए लूट लीजिए, एम्बीएंस मॉल की इस दूकान को'
  1. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/08/blog-post_4.html?showComment=1375600068993#c7337022295495301897'> 4 अगस्त 2013 को 12:37 pm

    बड़ा आश्चर्य लगा, ये किताबें बहुत दिनों से नहीं बिक रही थीं।

     

  2. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/08/blog-post_4.html?showComment=1376480230589#c3416025960473957617'> 14 अगस्त 2013 को 5:07 pm

    आह विनीत!!! उस दिन तुम्हारे चेहरे पर वो ख़ुशी देख कर वाकई 'दिन बन' गया था..

     

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