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मीडियाऔर प्रसारण के धंधे से जुड़ी खबरों पर नजर बनाए रखनेवाले लोगों के लिए साल की शुरुआत एक बड़े सवाल से हुई है। सवाल है कि देश के प्रमुख टेलीविजन समूह नेटवर्क 18 के संस्थापक और संपादक राघव बहल अगर इस बात से खुश हैं कि उनकी बैलेंस शीट इन्डस्ट्री की सबसे मजबूत वैलेंस शीट होने जा रही है और दूसरी तरफ देश के सबसे अमीर कार्पोरेट मुकेश अंबानी इस समूह में करीब 1500 करोड़ रुपये निवेश करने की घोषणा के बाद भी मीडिया की स्वायत्ता और उसकी आजादी को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होने की बात करते हैं तो इसे किस रुप में लिया जाए? अब संपादक अपनी किसी खबर से समाज पर पड़नेवाले असर के बजाय कार्पोरेट घरानों के साथ हुई डील से खुश है और इसके ठीक विपरीत कार्पोरेट ,मीडिया में करोड़ों रुपये निवेश करते हुए भी संपादक को ही मालिक बने रहने देना चाहता है तो इससे मीडिया के चरित्र पर किस तरह का असर पड़ेगा? इसी के साथ जुड़ा सवाल है कि जिस टेलीविजन समूह के संपादक और एंकर मीडिया सेमिनारों में लगातार कहते आए हैं कि वे मालिकों के हाथों मजबूर पत्रकार हैं और मीडिया पूरी तरह लाला संस्कृति का शिकार हो चुका है,क्या आनेवाले समय में उनके मुहावरे में कुछ तब्दीली आएगी? 

3 जनवरी को नेटवर्क 18( जिसमें कि टीवी 18 और उसके चैनल सीएनएन-आइबीएन,आइबीएन7,आइबीएन लोकमत,सीएनबीसी आवाज भी शामिल हैं,मनकंट्रोल डॉट कॉम और इन डॉट कॉम जैसी वेबसाइट हैं) और रिलायंस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड के बीच हुए करार के बाद दोनों की तरफ से जो प्रेस रिलीज जारी किए गए,वह अपने आप में दिलचस्प ही नहीं बल्कि एक हद तक चौंकानेवाला है। नेटवर्क 18 ने प्रेस रिलीज के शुरुआत में ही घोषणा की कि अब वह पूरी तरह कर्जमुक्त होने जा रहा है और आनेवाले समय में इटीवी के सभी क्षेत्रीय समाचार चैनलों पर उसका कब्जा होगा। इतना ही नहीं इटीवी के सभी मनोरंजन चैनलों पर उसकी पचास फीसदी की हिस्सेदारी होगी। मीडिया धंधे की खबरों से जुड़े लोगों के लिए यह हैरान करनेवाली बात थी कि जिस नेटवर्क 18 की गर्दन कर्ज में बुरी तरह धंसी हुई है और वह महीनों से इससे उबर नहीं पा रहा है,कर्ज की रकम बढ़कर 500 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो गयी है,अचानक ऐसा कौन सा करिश्मा हुआ कि वह 2100 करोड़ से भी अधिक रुपये लगाकर इटीवी का अधिग्रहण करने की हैसियत में आ गया? इटीवी के अधिग्रहण से वह कैसे कर्जमुक्त हो सकता है,यह बात प्रेस रिलीज के पहले तीन पैरा को पढ़ते हुए बिल्कुल समझ में नहीं आया। आगे उसने बताया कि समूह का रिलायंस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड की सहयोगी कंपनी इन्फोटेल के साथ व्यावसायिक समझौता हुआ है। यह ब्राडकास्ट से जुड़ी कंपनी है जो कि अपना विस्तार पैन इंडिया कंपनी के तौर पर करने की रणनीति बना रही है और साल के अंत तक 4जी सेवा शुरु करने जा रही है। समूह का करार इस बिना पर हुआ है कि इन्फोटेल नेटवर्क 18 की डिजीटल और इंटरनेट की सभी सामग्री का इस्तेमाल करेगी और आनेवाले समय में इन्टरनेट के जरिए लाइव टेलीविजन की लोकप्रियता तेजी से बढ़ेगी तो दोनों का इसका सीधा लाभ मिलेगा।


 प्रेस रिलीज में राघव बहल का कहना है कि नेटवर्क 18 के इतिहास में यह गर्व करने का समय है जब उस पर किसी तरह का कर्ज नहीं होगा और अब वह अपने को सिर्फ कंटेंट के स्तर पर मजबूत करेगी। फिलहाल नेटवर्क 18 की रगों में जब अंबानी का पैसा दौड़ना शुरु होगा तो उसकी कंटेंट पर क्या असर पड़ेगा,यह देखना हमें बाकी है। बहरहाल, इधर रिलांयस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड ने अपनी ओर से जारी प्रेस रिलीज में जो बातें कही है,वह विश्वास करने से कहीं ज्यादा अफसोस करनेवाली है कि कार्पोरेट की जुबान कितनी साफ-सुथरी होती है कि वह अभी भी सरोकार,मीडिया की आजादी और स्वायत्तता जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए लड़खड़ाती नहीं है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि कंपनी को राघव बहल की टीम और प्रबंधन पर पूरा भरोसा है इसलिए उनके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। नेटवर्क 18 और टीवी18 पर मालिकाना हक पहले की तरह बना रहेगा। इस करार से समूह की व्यवस्था किसी भी तरह से प्रभावित न हो इसे ध्यान में रखते हुए ही कंपनी ने सीधे-सीधे निवेश करने के बजाय स्वतंत्र रुप से एक ट्रस्ट का गठन किया है जो कि कंपनी का लाभ देखते हुए भी उसके दबाव में नहीं होगा। कंपनी ने यह करार सिर्फ इसलिए किया है कि इन्फोटेल जो 4जी सेवा शुरु करने जा रही है,उसमें देश के सबसे बड़े टेलीविजन और इंटरनेट समूह की सामग्री के उपयोग का अधिकार मिल सके। इसके साथ ही निवेश किए जाने से नेटवर्क 18 के लिए इटीवी का अधिग्रहण करने में आसानी होगी और इसका लाभ मिल सकेगा। हालांकि पिछले दिनों रिलांयस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड ने रामोजी राव की इटीवी को अधिग्रहण करने का मन बनाया था लेकिन सीधे तौर पर अधिग्रहण करने के बजाय नेटवर्क 18 में निवेश करने से भारतीय मीडिया पर उसकी पकड़ पहले से कई गुना बढ़ जाती है। 


संपादक राघव बहल अगर इस बात से खुश हैं कि उनकी बैलेंस शीट और नेटवर्क सबसे मजबूत होने जा रही है तो मुकेश अंबानी के लिए यह फायदेमंद सौदा नहीं है कि एनडीटीवी और न्यूज एक्स जैसे चैनलों पर किसी न किसी रुप में अपनी पकड़ बनाए रखने के बाद अब नेटवर्क 18 और इटीवी के चैनलों पर उसकी छाया हमेशा पड़ती रहेगी। वैसे भी कंपनी ने इटीवी के मनोरंजन चैनलों पर पचास फीसदी की अपनी हिस्सेदारी सुरक्षित रखेगी। इस तरह जो देश का सबसे बड़ा कार्पोरेट है,वही मीडिया मुगल भी हो जाएगा।

इस करार को लेकर दो-तीन चिंताएं साफतौर पर दिखाई देती है? सबसे पहले तो यह कि रिलांयस की इस घोषणा के बाद भी कि वह नेटवर्क 18 के प्रबंधन और स्वायत्ता को किसी तरह प्रभावित नहीं करेंगे,यह व्यावहारिक सच्चाई नहीं है। जो मीडिया कुछेक लाख के विज्ञापन के लोभ में कार्पोरेट के खिलाफ जुबान नहीं खोलता क्या वह इतनी बड़ी सौदेबाजी के बाद ऐसा कर सकेगा? ऐसे में अंबानी ने राघव बहल और नेटवर्क 18 के बाकी संपादकों को मालिक बने रहने की जो छूट दी है,उसका क्या अर्थ है? इसका एक मतलब तो साफ है कि अंबानी को इस बात की गहरी समझ है कि मीडिया अभी भी ऐसा धंधा नहीं है जिसमें मोबाइल,पेट्रोलियम और साग-सब्जी जैसे दूसरे धंधे की तरह सीधे कब्जा किया जा सके। टीवी चैनलों खासकर समाचार चैनलों को देखते हुए दर्शकों के दिमाग में यह बात स्थायी तौर पर बनेगी कि वे अंबानी के चैनल देख रहे हैं। इससे आनेवाले समय में खबर की साख पर तो असर पड़ेगा ही इसके साथ ही मीडिया के जरिए अंबानी जो खेल करना चाहते हैं,वह आगे चलकर सीधे-सीधे कार्पोरेट,जनता और सरकार की लड़ाई हो जाएगी। मीडिया में निवेश करनेवाला कोई भी कार्पोरेट मीडिया को इस तरह की छवि से दूर रखना चाहेगा। राघव बहल को मालिक बने रहने देने में यह सुविधा अपने आप छिपी है कि अंबानी का कहीं भी नाम या छवि की चर्चा हुए बगैर देश के सबसे बड़े टेलीविजन नेटवर्क पर कब्जा होगा और वही सब होगा जो अंबानी चाहेंगे।


 मालिक बने रहने के सुख के पीछ मीडिया की धार खत्म होने का कितना बड़ा दर्द छिपा है,यह शायद राघव बहल से बेहतर उनकी कंपनी में काम करनेवाले पत्रकार ज्यादा बेहतर तरीके से बता पाएंगे जो कि अब तक डंके की चोट पर नेशन को फेस करते आए हैं।( प्लीज- फेस दि नेशन सीएनएनआइबीएन का प्रोग्राम है इसलिए नेशन का फेस का हिन्दी न करें) दूसरी तरफ 4जी सेवा के साथ मुकेश अंबानी एक बार फिर मोबाइल और इंटरनेट के बाजार में उतरने जा रहे हैं। खबर यह भी है कि उनकी कंपनी पहले की तरह ही मोबाइल उपकरण और 5-7 हजार रुपये में ऐसे टैब मुहैया कराएगी जिस पर कि 4जी तकनीक आसानी से काम करेगा। इन मोबाइल और टैब के जरिए नेटवर्क 18 की सारी सामग्री प्रसारित होगी जिसमें कि इटीवी के क्षेत्रीय चैनल भी शामिल होंगे। यह समझने वाली बात है कि ऐसा होने से क्षेत्रीय स्तर पर मुकेश अंबानी की पकड़ कितनी मजबूत बनेगी और वह किस तरह से जनमत को प्रभावित करेंगे?

करार के साथ जरुरी चिंता यह भी है कि क्या आनेवाले समय में बाकी के मीडिया संस्थान अपनी आर्थिक असुरक्षा और लाचारी से निजात पाने के लिए इसी तरह किसी दूसरे कार्पोरेट घराने की गोद में गिरेंगे? नब्बे के दशक में जिन निजी मीडिया संस्थानों की शुरुआत इस घोषणा के साथ हुई थी कि हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं है,वे एक-एक करके सरकार का विरोध करते हुए भी कार्पोरेट घरानों के कल-पुर्जे बन जाएंगे? ऐसे में मीडिया के भीतर जिस सरोकार,सामाजिक जागरुकता और बदलाव की बात की जाती रही है,वह उसकी ब्रांडिंग का हिस्साभर होगा ताकि कार्पोरेट मंडी में उसकी उंची से उंची बोली लगायी जा सके? रामोजी राव ने इटीवी को जिस सोच के साथ खड़ा किया और व्यवसाय करते हुए भी क्षेत्रीय स्तर पर मीडिया की साकारात्मक भूमिका निभायी,वह क्या रिलांयस के लिए अपने पक्ष में जमीन तैयार करने से ज्यादा रह जाएगा? ठीक उसी तरह राघव बहल ने नेटवर्क 18 को देश का बेहतरीन मीडिया नेटवर्क बनाने के इरादे से खड़ा किया, क्या उसकी हैसियत कार्पोरेट के रहमोकरम पर बने रहने से ज्यादा का रह जाएगा? वे अब संपादक या पत्रकार से कहीं ज्यादा उद्यमी हैं तो इस बात से खुश हो सकते हैं कि उनका कारोबार पहले के मुकाबले तेजी से बढ़ेगी लेकिन 


जिन सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ ऐसे पत्रकार सरकार के आगे लाइसेंस मांगने जाते हैं,सालों तक दर्शक जिन पर भरोसा करते हैं,क्या इन दोनों के आगे किसी भी तरह का जबाब देने की स्थिति इनके पास रह जाती है? यह सच है कि सरकार कभी भी ऐसे पत्रकारों से सवाल-जबाब नहीं करेगी क्योंकि यह बिजनेस के नियम और शर्तों के अधीन हुआ है और न ही दर्शक उन सरोकारों का हिसाब मांगने जा रही है जिसका कि उन्होंने बतौर ब्रांड भुनाया है लेकिन सूचना संसाधनों के विकास के साथ-साथ सामाजिक जागरुकता का सवाल तो यही खत्म हो जाता है। राघव बहल और रजत शर्मा जैसे मीडिया उद्यमियों के पास जबाब है कि जब वे खुद ही नहीं रहेंगे तो मीडिया चलाकर क्या कर लेंगे? लोगों के सामने सवाल तो फिर भी है कि जब साख और लोगों का भरोसा ही नहीं बचेगा तो मीडिया चलाकर क्या कर लेंगे?
 (मूलतः जनसत्ता में प्रकाशित)
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5 Response to 'अब राजदीप सरदेसाई,आशुतोष के मालिक कौन?'
  1. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/01/blog-post_16.html?showComment=1326675166627#c4266599387252910350'> 16 जनवरी 2012 को 6:22 am

    मीडिया को राजनीति और व्यापार से यथासंभव बचा कर ही उसकी निष्पक्षता बनाये रखी जा सकती है।

     

  2. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/01/blog-post_16.html?showComment=1326678756655#c1661692055989055890'> 16 जनवरी 2012 को 7:22 am

    मीडिया पर हमेशा ही लालाओं की लार टपकती आई है

     

  3. Rangnath Singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/01/blog-post_16.html?showComment=1326691598843#c306407525521988339'> 16 जनवरी 2012 को 10:56 am

    लेख पसंद आया....

     

  4. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/01/blog-post_16.html?showComment=1326692389899#c1014917465644734409'> 16 जनवरी 2012 को 11:09 am

    प्रेस और मीडिया अब धनाड्यों के पाले में है... वह दिन लद गए जब सम्पादक अपनी जान पर खेल कर भी अपने पत्र की अस्मिता पर आंच नहीं आने देते थे॥

     

  5. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/01/blog-post_16.html?showComment=1326719389436#c5267484773522034685'> 16 जनवरी 2012 को 6:39 pm

    मीडिया कोई पहली बार लालाओं के कब्ज़े में जा रहा है क्या ?

     

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