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न्यूज24 के बारे में हमें जानकारी मिली कि वहां के मीडियाकर्मियों को दीवाली के मौके पर प्रिया गोल्ड बिस्किट के गिफ्ट पैक दिए गए। इसके अलावे न तो किसी तरह की बोनस और न ही चैनल की कोई निशानी ही। लिहाजा,उसे हमने फेसबुक पर साझा किया। फेसबुक पर एक के बाद एक कमेंट आने शुरु हुए जिसमें ये बताया गया कि कुछ चैनलों की हालत तो न्यूज 24 से भी खराब है। जो मीडियाकर्मी सार्वजनिक तौर पर कमेंट नहीं कर सकते थे,उन्होंने बारी-बारी से हमें फोन करके बताना शुरु किया कि उनके यहां तो तीस रुपये की कुरकुरे पैकेट में ही निबटाने पर राय-मशविरा चल रहा है,कुछ ने कहा कि हमारे यहां तो वो भी नहीं दिया गया। बात गिफ्ट पैक से शुरु हुई थी और वो सैलरी तक आकर विस्तार पाने लगी। अभी सबकुछ फन में चल रहा था,लोग एक-दूसरे चैनल की बात बताकर मजे ले रहे थे लेकिन आज सुबह जो फोन मेरे पास आया,उसे सुनकर फन का ये अंदाज एक मिनट में अवसाद में बदल गया। लगा कि न्यूज चैनलों के भीतर की जो बिडंबना है वो 32 रुपये की मांटेक सिंह वाली हैप्पी इंडिया से भी ई गुना बदतर है।

उसकी आवाज में एक खास किस्म का दर्द था। सर,तीन दिन से सोच रहे थे कि एचआर कुछ पैसे दे देगा तो घर जाने में राहत होगी। घर जाने के लिए टिकट बनी हुई है लेकिन जेब में सिर्फ दो सौ रुपये हैं। अभी कुछ दिन और दिल्ली में काटकर,ऑफिस की ड्यूटी बजाने के बाद जाना है। ऐसे में अगर सैलरी नहीं मिली तो हम क्या करेंगे? क्यों,तुम्हारे पास कुछ बचे पैसे भी तो होंगे और फिर किसी कूलीग से ले लेना। मेरे इस सवाल पर उसका और भी उदास कर देनेवाला जबाब था- सर जिनकी सैलरी पचास हजार से उपर है,उन्हें तो जुलाई से ही सैलरी रोक दी गई है और बाकी हम जैसे लोगों को अगस्त के बाद से पैसा ही नहीं मिला है। दीवाली में उम्मीद थी कि कुछ पैसे मिल जाएंगे,कुछ नहीं हुआ और उपर से आज के दिन भी शिफ्ट। नरक है सर नरक। मेरे मन में न जाने क्या आया-बेतुका सा सवाल कर गया- अच्छा ये बताओ,तुम्हारे यहां चाय-कॉफी की मशीन तो लगी होगी। ले आओ बिस्किट और पीओ दबाकर चाय। मैं तो ऑफिस की खुन्नस इसी तरह उतारा करता था। मुझे इन्टर्नशिप के दौरान वीडियोकॉन टावर की सातवीं मंजिल की वो बालकनी याद हो आयी जहां मैं और मेरा एक लेखक दोस्त चेनस्मोकर की तरह चाय पीते। खैर,उसका जबाब था-

सर,कहां रहते हैं आप? ऑफिस क्यों लगाएगी मशीन? ठीक से पानी का इंतजाम हो जाए वही बहुत है। आज तो ऑफिस में मातम-सा माहौल है। एख तो लोग बहुत कम आए हैं,उपर से सैलरी नहीं मिली है तो लोगों ा मन वैसे ही बुझा हुआ है। लगा कि कुछ नहीं तो आज की शिफ्ट में जो हैं,उन्हें मिठाई बांटी जाएगी,लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वो जब सबकुछ ऐसा बता रहा था तो लग रहा था कि कलेजा कट रहा हो। दीवाली पर मैंने भी कोई तैयारी नहीं थी,बस ये था कि दोपहर तक काम पूरी करके अच्छे से नहा लिया जाएगा और जो कुछ रखा-पड़ा है,उसे गर्म करके खा लेंगे। फोन पर चौदह बार दी गयी मां की नसीहतें और अधिकार जताने की हद तक सलाह देनेवाले  दोस्तों ने जब कहा -इंटल मत बनने लगना ज्यादा,मातम नहीं मनाने लगना कुछ नहीं तो मिठाई खा लेना और कैंडिल जला लेना तो लगा चलो थोड़ी ही सही तैयारी कर लेगें,उनका मन रखनेभर के के लिए। लेकिन फन में फेसबुक पर लिखी गई इस स्टेटस ने मन को एक के बाद एक कसैला कर दिया। बहरहाल

स्क्रीन पर दुनियाभर के चटकीले रंग शामिल कर लिए गए हैं। फैब इंडिया की भारतीयता से पूरा चैनल अटा पड़ा है। डार्क कत्थई,मरुन,बॉटल ग्रीन,गुलाबी जैसे रंगों में लिपटी चैनलों की एंकर दुनिया को बता रही है कि पूरे देश में कैसे दीवाली को लेकर धूम मची हुई है? मुझे तो हैरानी इन एंकरों पर होती है कि हजार-बारह सौ की सूट-सलवार और साड़ी में दुनिया को इतनी बड़ी खुशफहमी में रखने की कला कैसे सीख जाती है? वो बुलेटिन पढ़ने से पहले या बाद में क्या एक बार भी कैमरामैन,पीसीआ,फ्लोर मैनेजर औऱ स्पॉट ब्ऑय की तरफ नजरें नहीं घुमाती,अगर ऐसा नहीं करती तो सचमुच कितनी प्रोफेशनल है और घुमाने के बाद भी ऐसे ही खुशहाल इंडिया की खबरें पढ़ती चली जाती है तो सच में एक क्रूर कला है जिसका तेजी से विकास हो रहा है। मुझे तो ग्राफिक्स डिजायनरों पर भी हैरानी होती है कि क्या खाकर स्क्रीन पर इतने रंग भर देते हैं? माफ कीजिएगा,मैं एनडीटीवी की पैदा की गई पत्रकारिता की इस वरायटी को बिल्कुल भी फॉलो नहीं करना चाह रहा था कि जिस समय पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा हो,ठीक उसी वक्त किसी बच्चे को भीख मांगते दिखा दो। लेकिन यहां तो स्थिति उससे भी बदतर है। चैनल मंहगाई बम और मिठाई में मिलावट दिखाकर सरकार और सेठों की दीवाली तो जरुर खराब करने की कोशिश करता है लेकिन चैनल के भीतर का जो सच है,उस पर कौन बात करेगा?

उमा खुराना फर्जी स्टिंग ऑपरेशन करनेवाले चैनल लाइव इंडिया का आका सुधीर चौधरी ट्विट करता है- So Diwali celebrations begin! Here is the first shot by my son. yfrog.com/h7yjayesj। लेकिन उसकी इस ट्विट से वहां के मीडियाकर्मियों पर क्या बीतेगी,इसकी चिंता उसे रत्तीभर नहीं है। एक ने नाम बदलकर लिखा-इस दिवाली ये अपने बेटे के साथ पटाखे जलाता ट्वीट कर रहा है. चैन की बंसी बजा रहा है लेकिन लाइव इंडिया के लोग बिना सैलरी बिना बोनस काली दिवाली मनाने को मजबूर हैं "।  ये उस मानसिकता के मीडिया मैनेजर हैं जिनके हिसाब से मरनेवालों के साथ मरा नहीं जाता में यकीन रखते हैं लेकिन वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि पटाखे में लगायी जानेवाली आग कभी उन तक भी पहुंच सकती है।

आप मीडियाकर्मियों की उस मनःस्थिति की कल्पना करें जो दीवाली के नाम पर एक से एक सॉफ्ट और खुशहाली दिखानेवाली स्टोरी बना रहा हो लेकिन उसके भीतर रत्तीभर भी इस पर्व को लेकर उत्साह नहीं है। उसके पास इतने भी पैसे नहीं है कि वो आज के दिन कायदे से खा सके। बीबी-बच्चों के लिए कुछ घर ले जा सके। चैनलों का जो चमकीला चेहरा दिखता है,स्क्रीन पर पूरी दुनिया के सामने जो दिखाया जाता है,उसके भीतर कितना बड़ा काला सच दबा है,ये तब तक हमारे सामने उभरकर नहीं आएगा जब तक कि मीडियाकर्मी स्वयं इसके खिलाफ नहीं उतरेंगे और हमें पूरी उम्मीद है कि वो नहीं उतरेंगे। वो आज के इस मीडियाकर्मी की तरह ही हम जैसों को फोन करेंगे और बाद में कई बार दोहराएंगे,कुछ लिख मत दीजिएगा।

मुझे उसकी पूरी बात फोन पर सुनकर गुस्सा आ रहा था। थोड़ी देर के लिए उस पर और बाकी समय उस मीडिया संस्थान पर जहां के लिए वो काम कर रहा है। मैंने एक सवाल किया- काशी का अस्सी पढ़े हो? उसने कहा-नहीं। नहीं पढ़े हो तो पढ़ लो और जिस तरह से काशीनाथ सिंह बनारस के लोगों के बारे में लिखते हैं न कि दुनिया को लौड़े पर लेकर चलना यहां के लोगों की आइडेंटिटी है,उसी तरह से जीना शुरु करो। अपने अभाव को अपने उपर हावी होने देने से अच्छा है जाने दो होली,दीवाली,दशहरे को तेलहंड़े में। छोड़ों इन बातों पर भावुक होना या नहीं तो एक काम करो- जिस मीडिया हाउस में काम करते हो,उसका नाम टीशर्ट पर लिखकर जाकर उन्हीं मंदिरों और आश्रमों के आगे दो-चार दिन बैठ जाओ,जहां चैनल को सबसे बेहतरीन फुटेज मिलती है और जो कन्सर्न स्टोरी में लगाने के काम आती है। इसने तुम्हारी दीवाली खराब की है,तुम इसकी ब्रांड खराब करो। लिखो कि- इस चैनल में नौकरी की तो दीवाली जाएगी तेलहंड़े में। मेरी इस राय पर वो ठहाके लगाने लग गया लेकिन मुझे यकीन है कि वो ऐसा कभी नहीं करेगा। फिर किसी को फोन करेगा और इस दीवाली का रोना रोएगा, वो अभिशप्त है कहानी सुनाने के लिए और हम अभिशप्त है देश के बूढ़े,लाचार,भिखमंगे से कहीं ज्यादा ऐसे मीडियाकर्मियों के प्रति सहानुभूति रखने के लिए।
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7 Response to 'ऐसे चैनलों में काम करने से,दीवाली चली जाती है तेलहंडे में'
  1. जाट देवता (संदीप पवाँर)
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319635546552#c6678307922909959267'> 26 अक्तूबर 2011 को 6:55 pm

    शुभ दीपावली

     

  2. सतीश पंचम
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319637899475#c1332526727470153476'> 26 अक्तूबर 2011 को 7:34 pm

    ओह, बेहद दुखद विनीत। लोग हैं कि सारा कुछ बोनस फोनस मिलने के बावजूद इसलिये कसमसाते दिखते हैं कि दिवाली के माहौल में शाम जल्दी जाने न मिला और उधर ये हाल है कईयों को ऑफिसों से बोनस तो दूर तनख्वाह भी ढंग से न मिल पाई :(

    आजकल देखता हूँ किसी समाचारी चैनल पर वो सैक्स स्कैंडल वाला स्वामी नित्यानंद प्रवचन देता है। बाकायदा रंगा सियार बनकर, एकदम महीन महीन बोली बोलता हुआ। देखते ही मन में पहला सवाल यही उठता है कि जो स्वामी कल तक सैक्सबाजी करता हुआ ब्लर करके इसी चैनल पर दिखाया जा रहा था लानत मलामत विथ चटखारे व अब प्रवचन दे रहा है। चैनल की विश्वसनीयता ऐसे में क्या होगी समझा जा सकता है। या ये भी हो सकता है कि ऐसे स्वामी के पैसों के दम पर ही कुरकुरे या बिस्कुट का जुगाड़ बन पाता होगा।

     

  3. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319640218226#c3501441293341615899'> 26 अक्तूबर 2011 को 8:13 pm

    भाई, रोज़ी रोटी का मामला है, आपकी बात मान कर वह तेलहंडे में चला जाता:) दीपावली की शुभकामनाएं॥

     

  4. राजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319692980734#c8636317030672549751'> 27 अक्तूबर 2011 को 10:53 am

    क्या करें और कोई चारा भी तो नहीं है.पेट के लिए सब सहना पडता है.वैसे भी निजी संस्थानों में काम करने वालों की सोशल लाईफ तो खत्म ही हो जाती है.

     

  5. सञ्जय झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319696796687#c7952130459097338747'> 27 अक्तूबर 2011 को 11:56 am

    safed sach to sab dekhte kala sach koun dekta hai.......


    sadar.

     

  6. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319698539814#c3417385870323273103'> 27 अक्तूबर 2011 को 12:25 pm

    मैंने इतनी बुरी हालत की कल्पना नहीं की थी। लगता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की हालत प्रिन्ट से भी गयी गुजरी है?

     

  7. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html?showComment=1319765966897#c3129794960384448326'> 28 अक्तूबर 2011 को 7:09 am

    इसे पढ़कर दुख सा हुआ कि जगर-मगर सी लगने वाली नौकरी के ये हाल हैं।

     

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