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पिछले करीब पांच सालों में हिन्दी फिल्मकारों ने जिनमें कि मैं जान-बूझकर एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को भी शामिल कर रहा हूं, एक बिल्कुल ही अलग और बेहतर काम किया है कि दिल्ली को सियासत और सपनों का पर्याय शहर की छवि से बाहर निकाला है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दिल्ली में राजनीति और सियासत को लेकर पहले की तरह जोड़-तोड़ नहीं होते लेकिन सिनेमा हमें लगातार इस बात का एहसास कराने लगा है कि आमफहम जिंदगी में इसकी तासीर पहले से कम होने लगी है जबकि आमफहम जिंदगी ज्यादा शामिल होने लगी है। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि खुद राजनीति ही लोगों के जीवन में पहले की तरह कम शामिल है। राजनीति अब लोगों के लिए करने से ज्यादा ढोने या उसके नीचे दबे रहकर जीने की आदत ज्यादा हो गयी है,शायद यह भी कारण हो सकता है कि तब वो सिनेमा के लिए धीरे-धीरे कम प्रासंगिक होता चला जा रहा है या राजनीति के अलावे दूसरी ऐसी चीजें हैं जो ज्यादा असर करने लगी है।

दूसरी तरफ दिल्ली अब सपनों से कहीं ज्यादा हकीकत का शहर ज्यादा लगने लगा है। देशभर के अलग-अलग प्रांतों से,दूरदराज से आनेवाले लोगों के दिमाग में ये बात पहले से ज्यादा साफ होने लगी है कि ऐसा बिल्लुकल नहीं है कि यहां एक फैंटेसी की दुनिया है जहां शामिल होते ही हमारे सारे संघर्ष घुलकर खुशनुमा एहसास में तब्दील होते चले जाएंगे। अब सिनेमा में सात साल का रतन(अब दिल्ली दूर नहीं) नहीं होता जो सपनों को बतौर एनर्जी ड्रिंक के तौर पर इस्तेमाल करते हुए नेहरु से मिल आता है। पहले जो सारा संघर्ष दिल्ली आने भर का था,अब वो संघर्ष यहां रहते हुए और एक स्थायी भाव के तौर पर दिखाए जाने लगे हैं। ये भले है कि ये हमें उन संघर्षों को एक आदत के साथ बनाकर जीने की समझ पैदा करता है। इसलिए अब ये दिल्ली सोने की चिड़िया कहे जानेवाले भारत की राजधानी या दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र का केन्द्र ही नहीं, आदतों का शहर भी है जहां परिस्थितियों के साथ-साथ हील-हुज्जतों के बीच से जीने की आदत पैदा होने लग जाती है। कुछ लोग इसे मुंबई की जीवटता की तर्ज पर कला भी कह सकते हैं लेकिन ये कहना तभी सही होगा, जब वो कला में रोजमर्रा की घटनाओं को शामिल किया जाना अनिवार्य मानते हों।

इधर के हिन्दी सिनेमा ने दिल्ली के उपर से सियासत और सपनों का शहर का जो मुल्लमा हटाया,उसके बदले रोज की जिंदगी को पहले से कहीं ज्यादा शामिल किया है। हमने सिनेमा और दिल्ली के संदर्भ में रवीश कुमार को बतौर फिल्मकार के खांचे में इसलिए शामिल किया कि उन्होंने पिछले महीनों रवीश की रिपोर्ट में जिस तरह की दिल्ली को बतौर एक चरित्र और कहीं-कहीं खालिस परिवेश के तौर पर परिचय कराया है,छोटे पर्दे पर के कुछेक एपीसोड की इस अभिव्यक्ति को अगर साट दें तो बड़े पर्दे पर के सिनेमा से कहीं ज्यादा असर पैदा करती है। उसमें पहली बार दिल्ली का वो नक्शा उभरकर सामने आता है जिसमें लुटियन जोन गायब है,वो चमक-दमक गायब है जिसे दिखाकर हुक्मरान अपनी छाती फुलाते फिरते हैं फिर भी दिल्ली नायक है। ये वो दिल्ली है जिसमें कि देशभर का अभावग्रस्त समाज इकठ्ठे समाया हुआ है और टूरिस्टों को आकर्षित करनेवाली दिल्ली के बजाय यहां के अलग-अलग इलाके में जीनेवाली दिल्ली शामिल हुई है। इसे आप ओए लक्की लक्की ओए में बहतर तरीके से देख सकते हैं जहां दिल्ली नेशनल के बजाय लोकल हो जाती है।

राजधानी होने का जो घाटा दिल्ली अब तक सहती आयी है कि इसके कोई भी संदर्भ जब तक 28 राज्यों की इच्छाओं को तृप्त नहीं करते,तब तक ये तटस्थ शहर कैसे हो सकता है,ये जिद इधर के फिल्मों ने तोड़ा है। ऐसे में दिल्ली कहीं ज्यादा स्वाभाविक और विश्वसनीय लगती है। इसी तरह रंग दे बसंती की अपनी दिल्ली है जहां पुराने किले पर यंगिस्तान सवार है लेकिन गुजरते हुए जहाज को देखकर उसी तरह से हूट करता है जैसे कोई चालीस-पचास साल पहले जहाज देखने घरों से निकलकर देखने आने पर किया करते थे। पिछले महीने ही आयी फिल्म डेली-वेली, दिल्ली इतिहास के अपने उस हिस्से से हमें जोड़ती है जिसमें कि अभी भी वर्तमान गुलजार है। उत्तर-आधुनिकता और भारतीयता के नाम पर घिसे हुए चीकट संस्कार एक ही फिल्म में कैसे एडजेस्ट करती हुई जान पड़ती है,ये इस फिल्म की दिल्ली की खास बात है। वहीं दिल्ली-06 की दिल्ली में लोग से ज्यादा खबर और दिल्ली के बजाय मुंबई और रिएलिटी शो के सपने घुस आए हैं। दिल्ली में रहकर भी कोई सपना ऐसा है जो कि वहां से दूर जाकर पूरे होंगे,ये फिल्म रेखांकित करती है।..

 कुल मिलकर वैसकोप में कैमरे की निगेटिव(फिल्म) घुमाकर दिल्ली देखने का जो चस्का लंबे समय तक रहा और इसी वैसकोप ने दिल्ली की एक स्थिर छवि बनाने में भूमिका अदा की,उसे अब का सिनेमा छुड़ाकर उसे ज्यादा ईमानदार तरीके से पेश कर रहा है बल्कि लव,सेक्स और धोखा में तो दिल्ली क्या एनसीआर तक का ईलाका बड़ी ईमानदारी से छू जाता है। मतलब साफ है, आज जो दिल्ली को सिर्फ और सिर्फ त्रिमूर्ति लाइब्रेरी की सामग्रियों के दम पर समझने की कोशिश करेगा तो ये फिल्में उसे खुलेआम चैलेंज करेगी। इन फिल्मों ने ये स्थापित करने की कोशिश की है कि दिल्ली का कोई एक संस्करण नहीं है जिसे कि युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या अपने शोध के जरिए लगातार समझने की कोशिश कर रहे हैं।

मिहिर की इसी कोशिश में आज यानी 9 अगस्त को हिन्दी सिनेमा में दिल्ली विषय पर मोहल्लालाइव की ओर से एक बातचीत का आयोजन किया जा रहा है। जाहिर है इसमें जो भी वक्ता शामिल हैं, दरअसल दिल्ली को लेकर उनके अपने-अपने एक संस्करण है और जो लोग सुनने आएंगे,टुकड़ों-टुकड़ों में उनके संस्करण तो होंगे ही। ऐसे में हम कहें कि हर दिल्ली रहनेवाले और उसके बारे में सोचनेवाले की अपनी एक दिल्ली है और उसको लेकर एक अपनी समझ है तो कुछ गलत न होगा। अब सवाल है कि सिनेमा एक-एक करके उस समझ और नजरिए को कैसे पेश कर रहा है और ये संख्या कहां तक जाएगी,इस पर बात हो। जितनी फिल्में बन गयी,सो बन गयी। उसमें दिल्ली किस रुप में आयी है,इस पर भी बहस चलती रहे लेकिन और कितने एंगिल हो सकते हैं जिसमें दिल्ली को  परिवेश के अलावे चरित्र,संवाद और वक्तव्य के तौर पर देखा-समझा जा सकता है,इस पर भी बहस होगी,ऐसी हमारी उम्मीद है। हमें इस बात की खुशफहमी है कि अगर हम आज की इस बातचीत में शामिल नहीं होते हैं तो दिल्ली के किसी एक संस्करण पर बातचीत छूट जाएगी,ठीक उसी तरह से अफसोस भी रहेगा कि अगर आप नहीं आते हैं तो कई संस्करण को समझने से हम चूक जाएंगे।.तो आइए आज,हम दिल्ली के और कई संस्करणों पर बातचीत करें। देश के कुछ फिल्मकार भी शामिल हो ही रहे हैं,क्या पता उन्हें मेरी समझ की दिल्ली जंच जाए और वो कल को फिल्म का हिस्सा बने।
आपको कब और कहां आना है-
Time : 09 August, 6:30
Location : Stein Auditorium, India Habitat Center
[ near gate no. 3 ]
Lodhi Road, New Delhi
कैसे आएंगे-
मेट्रो से तो जोरबाग उतरकर दस मिनट की चहलकदमी के साथ
कौन बोलेंगे और कौन आपकी दिल्ली पर फिल्म बना सकते हैं
Akshat Verma | writer : Delhi Belly
Mahmood Farooqui | Historian & co director : Peepli Live
Ravikant | Historian & CSDS Fellow
Ravish Kumar | Excutive Editor : NDTV INDIA
in conversation with
Mihir Pandya | Research Fellow, DU
किसे हमें सहयोग और संपर्क करना है-
any query, plz call on 9811908884
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2 Response to 'आइए,आज सिनेमा की खिड़की से दिल्ली झांकते हैं'
  1. सुशीला पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html?showComment=1312863626269#c8959989586179135845'> 9 अगस्त 2011 को 9:50 am

    'राजनीति अब लोगों के लिए करने से ज्यादा ढोने या उसके नीचे दबे रहकर जीने की आदत ज्यादा हो गयी है,शायद यह भी कारण हो सकता है ।'

     

  2. Puja Upadhyay
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html?showComment=1316512433647#c5906921691206680382'> 20 सितंबर 2011 को 3:23 pm

    दिल्ली का ये पहलू हमसे छूट गया. दिल्ली वाकई हर किसी के लिए अलग अलग होती है, आपकी राय से सहमत हूँ कि आज की फिल्मों में दिल्ली के अलग अलग चेहरे बिना साज़-सज्जा के नज़र आते हैं.

    दिल्ली से मेरा भी दिली जुड़ाव है इसलिए किसी भी फिल्म में उसे देख कर एक बार हूक सी उठती है. नयी फिल्म 'मेरे ब्रदर की दुल्हन' में भी दिल्ली की गलियों का एक छोटा सा ही सन्दर्भ है जहाँ कार नहीं जा सकती...बस स्कूटर या पैदल जा सकते हैं.

     

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