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स एनडीटीवी के रवीश कुमार के चेहरे पर खोड़ा, आजादपुर सब्जी मंडी, मजनूं का टीला, पुरानी दिल्ली की गलियों और कापसहेड़ा की मजदूर बस्तियों से उड़नेवाली धूल-धक्‍कड़ जमी होती थी, अब उस चेहरे पर पॉमोलिव और जिल्लेट के मेकअप और एस्नो-पाउडर लिपे-पुते होंगे। टेलीविजन के फार्मूले के हिसाब से सोचें तो ये रवीश कुमार की अपग्रेडिंग है कि उन्हें दिल्ली और आसपास के इलाकों की खाक छानने के बजाय एनडीटीवी के एसी स्टूडियो में प्राइम टाइम में खबर के नाम पर बतकुच्चन और टाइमपास करने का मौका मिल रहा है।

आप नजर उठाकर देख लीजिए, एक जमाने में फील्ड के जितने भी बड़े टेलीविजन पत्रकार रहे हैं, उनकी अपग्रेडिंग इसी तरह से हुई है कि वो चैनलों की एसी स्टूडियो और न्यूजरूम में आकर बरगद की तरह जम गये और वो अब चैनल के चेहरे हैं। ऐसे में रवीश कुमार को हम दर्शकों का शुक्रिया अदा करना चाहिए और खुश होकर पार्टी-शार्टी देनी चाहिए कि उन्हें डी क्लास के लोगों के बीच, गंधाती नालियों और देहों के बीच जाने से मुक्ति मिली। टेलीविजन में काम करनेवाला अधिकांश मीडियाकर्मी यही चाहता है कि वो जितनी जल्दी हो सके, फील्ड की रिपोर्टिंग से हटकर, एंकरिंग करने लग जाए और उस गुरूर में जीना शुरू कर दे कि वही चैनल का चेहरा है।
10 जून को जब रवीश कुमार ने आखिरी रवीश की रिपोर्ट पेश की, तो आखिर में कुछ लाइनें कही। इन लाइनों के बीच अब तक की रवीश की रिपोर्ट के कुछ-कुछ फुटेज चलते और फिर वो आगे अपनी, अपने मन की बात कहते जाते। उन लाइनों में रवीश कुमार के अपग्रेडेड होने की खुशी और गुरूर नहीं बल्कि एक पत्रकार को साजिश के तहत मार गिराने की कोशिश का दर्द झलक रहा था। मैंने उनकी जब ये लाइन सुनी कि – जब तक टेलीविजन रिमोट पर आपकी हुकूमत चलती रहेगी, तब तक रवीश की रिपोर्ट वापस आने की संभावना बनी रहेगी… टेलीविजन देखने की आदतों में बदलाव जरूरी है, नहीं तो टीवी की खबरें गुफाओं में गुम हो जाएगी… तो लगा कि चैनल की साजिश के तहत एक बार फिर दर्शक मारा गया।
ये उस टेलीविजन पत्रकार का दर्द है, जो कि फील्ड में रहकर ज्यादा खुश था, कापसहेड़ा के दिहाड़ी मजदूर की थाली में खाकर ज्यादा तृप्त होता था, मुस्लिम लड़की की उस लाइन पर जिसकी आंखें झलझला जाती थीं कि – लोग कहते हैं मुससमान की लड़की नमाज पढ़ने के बजाय पहलवानी सीखती है, जो बिंदी बनाने और चूने से घर रंगनेवाली औरतों की स्टोरी करते हुए, उस पर बात करते हुए फट पड़ता है, जिसकी एक-एक रिपोर्ट हिंदी भाषा का नया विधान रचती थी, जिसमें हिंदी के भीतर रहकर भी हिंदी की जड़ता के प्रतिरोध में खड़ा होने का साहस दिखता था। उस आखिरी रिपोर्ट में ब्रेक लेने (ब्रेक क्या, बंद ही कहिए… एनडीटीवी ने बेशर्मी से चेहरा छुपाने के लिए ब्रेक का नाम दिया है) के बारे में बात करते हुए और प्राइम टाइम में एंकर के तौर पर हमारे बीच मौजूद होने की खबर बताते हुए रवीश हताश लग रहे थे। उस खबर को पढ़ते हुए इंडिया टीवी टाइप से एक ही शीर्षक बनता – हार गया पत्रकार, जीत गया शैतान टीआरपी।
फील्ड के रिपोर्टर से बतौर एंकर होने की इस घटना पर मैंने किसी भी टेलीविजन पत्रकार को इस तरह हताश, उदास और बेचैन होते नहीं देखा है और उनकी ये बेचैनी एक ही साथ कई सवालों से मुठभेड़ करने की मांग करती है।
सबसे पहली बात तो ये कि एनडीटीवी ने रवीश की रिपोर्ट बंद करके सिर्फ एक ऐसे कार्यक्रम को बंद नहीं किया है, जो कि दिल्ली और उसके आसपास के इलाके और कई बार देश के उस इलाके को लेकर बनाया जाता था, जो शायद ही कभी टेलीविजन खबरों का हिस्सा बन पाते बल्कि रवीश की रिपोर्ट कविता और रोटी की तरह टेलीविजन में भी उस समाज के दखल के लिए, उनकी मौजूदगी और हक के लिए आवाज बुलंद करता आया है। जहां टेलीविजन की एक-एक खबर नफा-नुकसान, टीआरपी, पेड न्यूज के गुणा-गणित की गिरफ्त में पूरी तरह जकड़ चुकी है, वहां किसको क्या चिंता पड़ी है कि चैनलों के हब नोएडा फिल्म सिटी के ठीक पास का इलाका खोड़ा, आधे से ज्यादा सीवर में डूबा हुआ है। किसे इस पर बात करने की चिंता है कि जीबी रोड हिकारत के बावजूद अपने भीतर एक दर्द की कथा ढोता हुआ जी रहा है, जो कि अंतहीन है। जिस अयोध्या के ऊपर तमाम चैनल सांप्रदायिक कील-औजारों को लेकर चील और गिद्धों की तरह टूट पड़े हो, वहीं टेलीविजन पर एक ऐसी रिपोर्ट है, जो कि अयोध्या को एक सिटी स्पेस, सांस्कृतिक दस्तावेज और एक जन्मभूमि की राजनीति के पीछे कई मंदिरों के खंडहरों में तब्दील होने की कहानी कहती हो। इस लिहाज से आप समझें तो रवीश की रिपोर्ट के बंद किये जाने का मतलब है एनडीटीवी ने दिल्ली और देश के उस बड़े समाज को अपने से बेदखल कर दिया, जिसके टेलीविजन में शामिल भर हो जाने से उनकी दशा बदल जाने की संभावना बनती दिखाई देती। ये दरअसल हाशिये के समाज को टेलीविजन से निकालकर बाहर फेंकने का काम है। उन लाखों जोड़ी आंखों और उनमें पल रहे सपने को रौंदने जैसा काम है, जो टेलीविजन के बूते अभी बदलाव और बेहतर होने की संभावना की उम्मीद रखते हैं।
आप एक-एक रिपोर्ट के फुटेज देखिए, आपको कौन लोग दिखाई देते हैं, कौन लोग बात करते नजर आते हैं और अपनी जुबान में क्या बात करते हैं? गौर करेंगे तो ये वो लोग हैं, जिनके लिए टेलीविजन और उनके लोग सरकार की ही तरह एक सत्ता है, जिसमें उनका न तो अब तक कोई दखल रहा है और न ही कोई पहुंच ही। चैनलों ने अगर कभी इन्हें कवर भी किया है तो एक ऐसे तमाशबीन और संकटग्रस्त समाज के तौर पर जहां सिर्फ और सिर्फ अपराध है, बलात्कार है, नौटंकी है, पाखंड है, जिसे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठकर देखनेवाला मध्यवर्ग या तो इसका उपहास उड़ाता आया है, हिकारत करता आया है, मनोरंजन-मसाला के तौर पर देखता आया है या फिर थैंक गॉड हमारे इलाके में ये सब नहीं होता है, कहकर खुश होता आया है। इस हाशिये के समाज में भी जिंदगी है, सपने हैं, आपात घटनाओं के अलावा भी स्वाभाविक जीवन की हलचल है और इन सबके बीच स्थायी पैदा की गयी समस्याएं हैं, ये रवीश की रिपोर्ट का ही हिस्सा हो सकती थी, जुर्म, सनसनी या रेड अलर्ट की नहीं। टेलीविजन के ऐसे कार्यक्रमों ने हमें समाज के ऐसे इलाकों और लोगों के प्रति हिकारत और उनसे अलग होने के लिए उकसाया, रवीश की रिपोर्ट ने उस समाज को अपने ही बीच के लोग या फिर हमारे दौर का भी कभी यही सच था के तौर पर प्रस्तावित किया।
आज अगर कोई दिल्ली को समझना चाहे, तो ये रिपोर्ट अपने को दिल्ली सरकार और इतिहासकारों की बतायी दिल्ली से अपने को प्रतिपक्ष में खड़ी करती है। जिसने भी इस रिपोर्ट को लगातार देखा है, उसे मजाल है कि दिल्ली शब्द बोलने से दुनियाभर की सड़ांध, गलियों, इलाकों, सड़कों और इन सबके बीच बेबस हालात में जीनेवाले लोगों के पहले लुटियन जोन या इंडिया गेट याद आ जाए। एक-एक रिपोर्ट केस स्टडीज के तौर पर हमारे सामने है। आपको देखकर हैरानी होती होगी कि न्यूज चैनल की कोई रिपोर्ट, दर्शकों की अथॉरिटी बनने के बजाय इतनी मार्मिक और संवेदनशील भी हो सकती है?
जब रवीश की रिपोर्ट शुरू हुई थी, मैंने उसके दो-तीन ही एपिसोड देखे थे कि एक ही साथ मन में दो बातें स्पष्ट हो गयी थी – एक कि टीआरपी की बेहूदी दौड़ में ये प्रोग्राम शायद ही अपनी जगह बना पाये और दूसरा कि कभी न कभी सैंकड़ों चैनलों की चिल्ल-पों के बीच भी इसका कुछ असर होगा। हम सप्ताह दर सप्ताह इन दो बातों के बीच डूबते-उतरते रहे कि कहीं टीआरपी का रोना रोकर चैनल इस प्रोग्राम को बंद न कर दे और दूसरा कि अभी तक कहीं कुछ हुआ क्यों नहीं? महीने दर महीने बीतते गये और हमने देखा कि रवीश की एक ही रिपोर्ट कई बार रिपीट होती है। इस दोहराव से कई बार मन ऊब जाता लेकिन ये सवाल तो जरूर उठता कि अगर इस प्रोग्राम की टीआरपी ही नहीं है, तो फिर चैनल इसे बार-बार क्यों रिपीट करता है? अब बंद करने की स्थिति में ये सवाल भी है कि क्या इस बैंडविथ और समय के बाकी प्रोग्राम की टीआरपी इससे बहुत अधिक है? अगर नहीं तो फिर इसे ही निशाना बनाने की जरूरत क्यों महसूस की गयी? तभी हमने ये भी देखा कि एनडीटीवी ने अलग से प्रोमोशनल फुटेज चलाने शुरू कर दिये हैं – रवीश की रिपोर्ट का असर, खोड़ा को मिले तीन सौ करोड़ रुपये। हम जिस असर के इंतजार में थे, वो हमें साफ दिखाई देने लगा था। एनडीटीवी ने भी इस उपलब्धि को एनजॉय किया और हम लगभग निश्चिंत हो गये कि रवीश की रिपोर्ट अब टीआरपी के खेल से बाहर है और चूंकि इसका असर बहुत अलग किस्म का है और सीधा है इसलिए ये लंबे समय तक हमारे बीच बना रहेगा।
खोड़ा की रिपोर्ट के बाद ग्राफिक्स बेहतरीन हो गया, साफ लगा कि इस पर पैसा खर्च किया जा रहा है। उसी समय बनियान, बिल्ली और बंगाल नाम से रिपोर्ट आयी और लगा कि रवीश की रिपोर्ट का दायरा दिल्ली, एनसीआर से आगे बढ़ेगा। लेकिन जिस झटके के साथ इसके अंत की घोषणा की गयी, किसी के मन में भी ये सवाल उठेगा कि जब प्रोग्राम की टीआरपी ठीक आ रही थी, समाज पर इसका सीधा असर हो रहा था जो कि न्यूज चैनल के किसी प्रोग्राम का अब कम ही असर होता है, एक नये और अलग किस्म का दर्शक वर्ग तैयार हो रहा था, जो लोग टेलीविजन को बकवास और दो कौड़ी की चीज मानकर बिदक गये थे, इस प्रोग्राम के बहाने टेलीविजन की तरफ वापस आ रहे थे, फिर इसे क्यों बद कर दिया गया? क्या ये एनडीटीवी की नोकिया मोबाइल की स्ट्रैटजी है कि जो मॉडल ज्यादा पॉपुलर या बिक्री में आने लगे, उसे बंद कर दो। ऐसा इसलिए कि इससे बाकी के मॉडल की बिक्री पर बहुत बुरा असर पड़ता है। रवीश की रिपोर्ट के साथ भी क्या कुछ ऐसा ही हुआ?
हमने अपने जीवन में पहली बार देखा था कि आम आदमी तो छोड़िए, कदम-कदम पर खुद कई पत्रकार रवीश के साथ फोटो खिंचाने के लिए मार किये जा रहे थे। अन्ना हजारे के अनशन पर हरेक कदम के बाद एक पत्रकार/भावी पत्रकार फोंटो खिंचाना चाह रहा था और रिपोर्ट की तारीफ कर रहा था।
आज एनडीटीवी ने इन सबके बावजूद इसको बंद करने का जो फैसला लिया है, पता नहीं क्यों हमें लगता है कि इसके पहले उसे हमलोगों से राय लेनी चाहिए थी। वैसे तो वो आजाद है कि जो चाहे जारी रखे, जो चाहे बंद रखे। लेकिन इस फैसले के साथ हम अपना हक इसलिए समझते हैं कि इसे हमने चैनल के प्रोमोशनल प्रोग्राम और उसके विज्ञापन के बहकावे में आकर देखना शुरू नहीं किया। हमने इसे अपनी इच्छा और बहुत ही भावनात्मक स्तर पर जुड़कर देखा और चूंकि ये हिंदुस्तान है, जहां भावनात्मक मसले पर कई बार न्यायालय के फैसले तक बदलने पड़ जाते हैं, तो ऐसे में टेलीविजन का एक कार्यक्रम बहुत बड़ी बात नहीं है और एनडीटीवी को इस भावनात्मक जुड़ाव पर फिर से गौर करना चाहिए। आज अगर एनडीटीवी का बहुत थोड़ा ही सही लेकिन दर्शक वर्ग बढ़ा है, तो उसमें कुछ न कुछ हिस्सा जरूर होगा, जिसने सिर्फ और सिर्फ रवीश की रिपोर्ट के कारण देखना शुरू किया होगा। चैनल इस सच को इतनी बेरहमी से कैसे नजरअंदाज कर सकता है?
हम जितने लापरवाह और गैरजिम्मेदार होकर किसी भी चैनल और कार्यक्रम को बकवास करार दे सकते हैं, उतनी ही गंभीरता से किसी अच्छे कार्यक्रम के बने रहने की मांग भी कर सकते हैं और पैसे लगाकर देखनेवाले हम दर्शकों का हक है कि हम एनडीटीवी के हुक्मरानों से इस बात की मांग करें कि आप एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके हमें ये स्पष्ट करें कि आपने इस प्रोग्राम को बंद करके हमारी भावनाओं का, चुनाव का अपमान क्यों किया? आपके पास एक ही तो कार्यक्रम था जो लोगों के बीच उदाहरण था कि हिंदी चैनल में सब कूड़ा नहीं है, आपने उसे भी हमसे छीन लिया, इसका आपको जवाब तो देना ही होगा। अब चूंकि हर मांगें और विरोध अनशन के पैकेज में आने लगे हैं, तो ऐसे में अर्चना कॉम्प्लेक्स (एनडीटीवी का दफ्तर) हम दिल्ली में रहनेवाले लोगों के लिए बहूत दूर नहीं है। हम चाहते हैं कि चैनल इस मामले में प्रेस रिलीज जारी करके स्पष्टीकरण दे। नहीं तो हमारा इस चैनल को लेकर प्रतिरोध और बहिष्कार जारी रहेगा। हम मैनचेस्टर के व्यंजन में जायका इंडिया का दिखानेवाले चैनल को और अधिक नहीं झेल सकते।
मूलतः प्रकाशित- mohallaive
रवीश की सारी रिपोर्ट देखने के लिए चटकाएं- ndtv
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4 Response to 'रवीश की रिपोर्ट बंद, टीवी से बेदखल हुआ हाशिए का समाज'
  1. सञ्जय झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/06/blog-post_13.html?showComment=1307941090306#c6661411793062691486'> 13 जून 2011 को 10:28 am

    thanx veenit bhai..........aapne hum aam samaj ke logon ke vichar/virodh dridhta se rakha hai uske
    liye......abhar.......

    sadar..

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/06/blog-post_13.html?showComment=1307980879822#c978940898949657939'> 13 जून 2011 को 9:31 pm

    यह तो प्रमोशन हुआ न।

     

  3. Pratibha
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/06/blog-post_13.html?showComment=1307985675042#c7454152176254008470'> 13 जून 2011 को 10:51 pm

    Vineet ji jahan tak mujhe jankari ravish ki report ko viram diya gaya h..band nahi kiya gaya...

     

  4. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish')
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/06/blog-post_13.html?showComment=1308460114905#c8889999740114408296'> 19 जून 2011 को 10:38 am

    न्‍यूज चैनलों के नौटंकी चैनलों में बदलते जाने का यह एक सटीक उदाहरण है।

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    2 दिन में अखबारों में 3 पोस्‍टें...

     

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