.

ये आठ के ठाठ है बंधु

Posted On 2:15 am by विनीत कुमार |

दिल्ली में आए पांच साल हो गए, अभी तक दिल्ली की ठंड का मुंहतोड़ जबाब देने के लिए एक भी स्वेटर नहीं है। आपसे मांग नहीं रहा हूं और न ही ये कह रहा हूं कि मेरे लिए कुछ चंदा कीजिए, कुछ मत कीजिए बस ये पोस्ट पढ़ लीजिए और वैसे भी मांगने की गलती मैं दिल्ली में कभी नहीं करता। कुछ भी मांगोगे तो यूरो की तरह राय ही मिलेगी।
शुरु के दो साल तो इस शेखी में कट गए कि हिन्दू कॉलेज का स्टूडेंट हूं, सीनियर ने पुराने सेशन के स्वेट शर्ट आधे दाम पर दे दिए और बाद में आपस में बतियाते कि साले को बनाया चुतिया, नाम लिखाया है 2002 में और स्वेट शर्ट दे दिया 2000 का। एकाध बार एक-दो लेडिस ने पूछा भी कि विनीत तुम तो उस समय कॉलेज में थे भी नहीं तो फिर ये स्वेट शर्ट कैसे। क्या बताता कि पैसे बचाने के लिए आधे दाम पर लिए हैं। फिर सोचता बाहर कौन जानता है कि मैं कब से हिन्दू कॉलेज में पढ़ रहा हूं। और अच्छा ही रहेगा कि लोग पुराना हिन्दुआइट समझकर पल्टी नहीं खाएंगे। एक दो लेडिस जो कि अब बाल-बच्चेदार और जिम्म्दार हो गयी है, मिलने भी आती है तो अपने पति या फिर ननद के साथ। पति के साथ आने पर उससे उतनी ही मीठे से बात करती है जितने मीठे से तीन साल पहले मुझसे बात करती थी और अपने पति को तब कजिन या बुआ का लड़का बताती थी। खैर, एक बार उसने कहा कि फेंको तुम ये अपनी पुरानी स्वेट शर्ट, मैं तुम्हारे लिए मम्मी से बोलकर बड़ा प्यारा सा स्वेटर बनवा दूंगी, बस तुम वनिता का बुनाई विशेषांक वाला अंक खरीद लेना। वैसे भी वो खुद तो बुन सकती नहीं थी, अल्ट्रा मॉर्डन होने के चक्कर में ये सब सीखा कहां था।
नयी-नयी ब्याही मेरी दीदी को मुंह दिखाई में खूब पैसे मिले थे और उसका उसने ढेर सारा ऊन खरीद लिया था । बार-बार फोन करके कहती अपना साइज बताऔ न, तुम्हारे लिए भी एक स्वेटर बना दूंगी। मैं अब दीदी के हाथ का कटोरी वाले डिजाइन की स्वेटर क्यों पहनता. शेखी मारते हुए कहता, दीदी अब तुम ये सब की चिंता मत करो, यहां दिल्ली में तुम्हारी भाभी संभाल लेगी। दीदी को धक्का लगता और तुनककर बोलती, ठहर तेरे पैसे बंद करवाती हूं।
दो साल तो उस पुराने स्वेट शर्ट में कट गए। गजब का कॉन्फीडेंस होता उस हिन्दू के स्वेट शर्ट को पहनकर। नाइकी और रिवॉक के शोरुम तक बिना हिचक के टहल आता। एक-दो बार मैकडी भी गया था।
फिर कोठारी हॉस्टल के लोगों ने जोड़-तोड़ करके स्वेट शर्ट छपवाया। मैं भी लगा था उसमें। मेरी नियत होती कि पैसा भी कम खर्चा हो और सोसाइटी में स्टेटस भी बनी रहे और ये हॉस्टल के स्वेट शर्ट से ही संभव था। पीछे लिखा रहता हॉस्टलर और हमलोग पहनकर कैंपस में अपने को तोप समझते। एक बार भद्द पिटी थी पेज थ्री पार्टी और दो-तीन के टोकने पर आरती भाभी की शाल ओढनी पड़ी थी औऱ बताना पड़ा कि जी तबीयत ठीक नहीं है। फिर भी दो साल कट गए। लेकिन तब तक कॉलेज या हॉस्टल के स्वेट शर्ट से थोड़ा मोहभंग हो गया था।
अगले साल थोड़ा दिमाग भिड़ाया और कॉम्युनिटी प्रोग्राम के तहत स्वेटर या गरम कपड़े खरीदने की योजना बनायी। अपने मिजाज के चार लोग जुटे और पांच-पांच सो रुपये पूल किया और गर्मी में ही सात स्वेटर आधे दाम पर खरीदे। और खूब बदल-बदलकर पहना। अपन दो बंदे हिन्दी के थे, सो हमेशा ध्यान रखते कि एक दूसरे का मैच न हो। सबसे मौज में ये साल काट लिया और मनाता रहा कि सालोभर ठंड पड़े तो भी दिक्कत नहीं है।
इस साल ठंड गिर चुकी है। लेडिस अब भी आती है लेकिन स्वेटर पर कभी बात नहीं होती, स्वेट शर्ट भी इधर-उधर हो गए। साझा में जो स्वेटर खरीदा था, उसकी दुर्गति हो गयी। एक बंदा एचडीएफसी में लगा है, सो हॉस्टल छोड़ते समय दानवीर कर्ण की भूमिका में तीन स्वेटर दान कर गया। एक को एमपीपीसीएस में नौकरी लगी है, सारे पुराने कपडे सहित दो स्वेटर एनजीओ को दान कर दिया। बाकी के दो स्वेटर हिन्दी वाला बंदा ये कहकर पचा गया कि पिछले साल मैं पहना था तो अबकी तुम कैसे पहन सकते हो।...मैं अपने कवर्ड को चकचक रखने के चक्कर में एक भी स्वेटर नहीं रखा था।
कल ही एक मित्र आए थे, रात में मीडिया की ड्यूटी बजाकर। लेकिन बहुत खुश थे। बात छेड़ दी कि भाई हजार रुपये जो लिए थे उसे लौटा दो। कैश न हो तो क्रेडिट कार्ड से एक स्वेटर ही खरीद दो...उसने कहा. ... स्वेटर क्या चलो कोट ही खरीद देता हूं, दिसम्बर में मेरी शादी है, वहां भी काम आएगा। खूब भटका कमलानगर। कोट-पैंट देखते ही मुझे टीटीइ, वकील या फिर एंकर याद आने लगते। मैंने कहा भइया मुझे ठंड काटनी है, काहे का कोट-पैंट के चक्कर में पड़े हो। शादी के समय तो हॉस्टल में मैनेजमेंट के बंदे वाले भी दे देंगे, स्वेटर ही खरीद दो। उसने कहा तो फिर ठीक है, चलो और चन्द्रावल की ओर बढ़ने लगा और ठेके पर पहुंचकर एकदम से बोला। साले.....बड़ी मुश्किल से तुम्हारे भाई को ढंग की लड़की मिली है, शादी तय हुई है और तुम स्वेटर के पीछे जान हलाल किए हो और फिर दो चमचमाता हुआ पीले रंग का डिब्बा लेकर बोला, देखो आज मना मत करना। मीडिया से हैं, तुम्हारे हॉस्टल वार्डन से हम निबट लेंगे और फिर हमारा-तुम्हारा तो साइज एक ही है न। मैं गरियाता, लेकिन कान में बस एक ही आवाज सुनाई पड़ रही थी.......

ये आठ के ठाठ है बंधु, तब सुलगेगी चिंगारी
| edit post
5 Response to 'ये आठ के ठाठ है बंधु'
  1. हरिमोहन सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html?showComment=1195806540000#c4956317808128273692'> 23 नवंबर 2007 को 1:59 pm

    मस्‍त ।

     

  2. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html?showComment=1195807080000#c488100526322599140'> 23 नवंबर 2007 को 2:08 pm

    बढिया. तो ये है आपके ख़ूबसूरत स्वेटरों का राज़. मज़ा आ गया.

     

  3. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html?showComment=1195809960000#c5303667290890984823'> 23 नवंबर 2007 को 2:56 pm

    मस्त!!

    हास्टल लाईफ़ के एक से एक पहलुओं को उजागर कर रहे हैं आप!
    पिछले दिनों एक फ़िल्म देखी, "दिल दोस्ती एट्सेट्रा" ज़रा इस संदर्भ में कुछ हो जाए!

     

  4. बाल किशन
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html?showComment=1195825860000#c286693527423697530'> 23 नवंबर 2007 को 7:21 pm

    आपका रोचक और मज़ेदार अनुभव पढ़कर अच्छा लगा.

     

  5. kamlesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html?showComment=1195998540000#c120409723597278001'> 25 नवंबर 2007 को 7:19 pm

    8 ka tadka to delhi ki jaan ban chuka hai bhaiya. bahut he sateek comment hai aapka
    by the way bhabhi se bolkar iss sardi se bachne ke liye ek sweter mere liye bhi....
    shubhkamnao saheet

     

एक टिप्पणी भेजें