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देखियो जरा इस बैन की लौ.. को. इस रंडी से टिकट मांग रहा है. इस चूतिए को पता नहीं है कि रंडी से कुछ और मांगी जाती है..उसके बाद एक-दूसरे की हथेली पर जोर से मारते हुए ठहाके का दौर.

लंबे इंतजार के बाद जब सामने से डीटीसी 234 आती दिखाई दी तो मैं जिस बदहवासी में बस में घुसा ( वैसे भी इत्मिनान से चढ़ने जैसी कोई स्थिति होती भी नहीं) उतनी ही बदहवासी से बिना ये देखे कि कौन है, टिकट काटनेवाले की सीट के आगे बीस के नोट बढ़ा दिए. जब उसने नोट लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाए और न ही टिकट काटने की कोई हरकत की तो मैं गौर से देखने लगा. एक लड़की बैठी थी. 

इन दिनों डीटीसी में जो नई बहाली हुई है, उसमे हम उम्र लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की भी काफी हुई है..इनमे से कई डीटीसी की लाइनवाली समीज और ब्लू सलवार यूनिफार्म के बजाय नार्मल कपड़े में होती है. ऐसे में कंडक्टटर की सीट पर लड़की का होना स्वाभाविक ही था..लेकिन पीछे से तीन बार उसके लिए रंडी शब्द और मेरे टिकट मांगने पर देखियो बैन की लौ..का इस्तेमाल उस स्कूली छात्र ने किया तो मन कैसा-कैसा हो गया..पता नहीं क्यों लगा कि कल को यही लड़के 16 दिसंबर जैसी घटना को अंजाम देंगे.

मैंने उस लड़की को सॉरी बोलते हुए, उसके बाद वाली सीट पर बैठे कंडक्टर की तरफ बीस का नोट बढ़ाया और माल रोड तक के लिए टिकट मांगी. कंडक्टर ने हमें लड़की से टिकट मांगते हुए देख लिया था. ऐसे में जब मैं उससे टिकट मांगने गया तो मुस्कराने लगा- क्या सर, चक्कर खा गए..मैं बुरी तरह अपसेट हो गया था लेकिन कुछ कहा नहीं. कंडक्टर ने समाज सेवा के नाम पर इतना जरुर किया था कि जो उसकी अकेले की सीट होती है, उसे उस लड़की को दे दिया था ताकि उसके बगल की सीट खाली न रह जाए..क्योंकि उसके तो माथे पर लिखा था कि वो रंडी है..भला इतने बड़े-बड़े अक्षरों में ये शब्द लिखा देख कोई कैसे बैठ सकता था. भेदभाव, छुआछूत का पालन सामाजिक रुप से हो इसके लिए कंडक्टर ने अपने विशाल ह़दय का परिचय दिया था.

अपनी सीट पर आकर बैठा था कि करीब सात-आठ स्कूली लड़कों का हुजूम रंडी और बैन की लौ दो शब्दों को पकड़कर ठहाके लगाते रहे...ऐ भाई, चल हम इस रंडी से मांगते हैं, पूछते हैं देगी..फिर ठहाके..भाई साहब को तो मना कर दिया. एक मन किया इन्हें पास बुलाकर समझाउं कि क्या कर रहे हो ? किसी की उम्र 16 से ज्यादा नहीं होगी. नौवी-दसवीं के बच्चे. आखिर में एक को कहा- ऐसे ही बात करते हैं, तुम्हें पता है कि वो क्या है जो इस तरह के शब्द इस्तेमाल कर रहे हो और मेरे लिए लगातार गाली..अगर पलटकर मैं तुम्हें पीटना शुरु करुं तो ?

ये ले भाई, इस बस में गांधीजी बैठ्ठे हैं..फिर ठहाकों का दौर..अंकलजी, बस की सवारी करते हो तो तसल्ली से बैठे और तसल्ली से उतर जाया करो, ज्यादा नूलेज झाडोगे तो अपनी भी ठीक से झड़ती है, डाल देंगे. हमदोनों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते जब वो ऊब से गए तभी अगली स्टैंड पर एक दूसरा लड़का किसी दूसरे स्कूल का चढ़ा. सब उस पर पिल गए.

कहां से आ रहा है ? स्कूल से..अबे चूतिये, स्कूल ड्रेस पहन रखी है तो स्कूल से ही आ रहा होगा, ये तो पता ही है.फिर ठहाके. किस क्लास में है ? ग्यारहवीं. अच्छा ये बेल्ट कितने में ली ? तीस रुपये. तभी एक लड़का उसकी बेल्ट की बक्कल खोलकर देखने लग गया और बक्कल से हाथ नीचे की तरफ सरकाने लगा..मेरे लिए अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया था. वो बेहद दुबला-पतला कमजोर सा लड़का रुंआसा सा हो गया था. बाकी बस में बैठे लोगों की एक अलग दुनिया थी..इन सबसे बेफिक्र..तभी उस लड़की ने एक की कॉलर पकड़ी- अरे हरामी, कुत्ते का जना, आदमी को ही हैवान..स्साले हम तुम्हें रंडी नजर आते हैं, ये साहब( मेरी तरफ देखकर) बैन के लं..और ये लड़का, इससे तू मस्ती करेगा..खड़ा होता है रे हरामी तेरा, उतर तेरी मैं औकात दिखाती हूं..इस अकेली मजबूत आवाज से बस के बाकी लोगों के बीच हलचल शुरु होने लगी थी.( कहानी -डीटीसी 234)
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8 Response to 'देखियो, इस बैन की लौ..से, रंडी से टिकट मांग रहा है'
  1. सागर
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378819755752#c3886275265030136641'> 10 सितंबर 2013 को 6:59 pm

    ladkiyan gaali dene par utar aaye to kisi ka kuch nahi chalta...

    waise dotted jageh bhi bhar dete ko koi aapatti nahi hoti...

     

  2. rohen singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378827044110#c5059665129568147626'> 10 सितंबर 2013 को 9:00 pm

    Awsome

     

  3. अभिषेक मिश्र
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378828314053#c4287330520505887863'> 10 सितंबर 2013 को 9:21 pm

    ऐसी ही आवाज की जरुरत है...

     

  4. राजेश चड्ढ़ा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378830020801#c6341870441181213307'> 10 सितंबर 2013 को 9:50 pm

    zarurat hai isi ki

     

  5. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378830778033#c2987289470922217801'> 10 सितंबर 2013 को 10:02 pm

    एकदम जोरदार चांटे जैसी पोस्ट कहूं या धमाके दार घूंसे जैसी । यदि आज के हालातों को बदलना है तो ऐसे चमाटे और घूंसे पडते रहने चाहिए । बेबाक और बिंदास पोस्ट , विनीत भाई

     

  6. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378833955557#c6039146767885872884'> 10 सितंबर 2013 को 10:55 pm

    क्या बात है!

     

  7. surabhi sneha
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378845119742#c8914899793680851769'> 11 सितंबर 2013 को 2:01 am

    ...पता नहीं क्यों लगा कि कल को यही लड़के 16 दिसंबर जैसी घटना को अंजाम देंगे...सही कहा सर
    यही संस्कृति तो हमें ले डूब रही है। मेरी तो समझ नहीं आता कि मां बहन कितनी सस्ती हैं कि गालियां भी उन्हीं के नामों से शुरू होती हैं। जिस दिन ये मां बहन के नाम पर गालियां बंद हो जाएंगी न सर उस दिन से 16 दिसंबर जैसी घटनाओं में कमी आने लगेगी...आप देखना

     

  8. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/09/blog-post_10.html?showComment=1378856874556#c4504546170655065161'> 11 सितंबर 2013 को 5:17 am

    अंत में जान पाया कि यह ‘कहानी’ है। मैं तो सच मानकर पढ़ता और कुढ़ता जा रहा था। जबरदस्त बुनावट है जी...।

     

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